मंगलवार, 29 अगस्त 2023

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता क्‍यों कहे गए हैं हनुमानजी


“अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता॥” Asht Siddhi navnidhi Ke data as var din Janki Mata का जप करने से धन दौलत ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

Asht Siddhi navnidhi Ke data as var din Janki Mata | हनुमान चालीसा की चौपाइयों का जप सभी करते हैं इसकी प्रत्येक चौपाई में अलग-अलग रहस्य समाए हुए हैं। हनुमान चालीसा की चौपाई जैसी भी है जो धन दौलत ऐश्वर्य प्रदान करती है। इस विशेष चौपाई का विधि विधान पूर्वक जप किया जाए तो मनुष्य को मनचाही सफलता के साथ-साथ धन की प्राप्ति होती है।

यह चौपाई है

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता॥ ( Asht Siddhi navnidhi Ke data as var din Janki Mata ) गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा, वीर हनुमान को प्रसन्न करने के लिए सबसे सरल और शक्तिशाली स्तुति है। इसकी हर चौपाई अलग अलग रूप से शक्तिशाली है। जीवन की हर समस्या का समाधान हनुमान चालीसा द्वारा किया जा सकता है। हनुमान चालीसा का पाठ करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा के माध्यम से हनुमानजी के बल, बुद्धि व पराक्रम का वर्णन किया है। हनुमान चालीसा की अनेक चौपाइयों में हमारी समस्याओं का समाधान भी छिपा हुआ है। इन चौपाइयों का प्रत्येक आदमी के जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है।

सभी जानते हैं कि भगवान राम के प्रिय भक्त हनुमान जी अजर और अमर हैं। हनुमान ऐसे देवता हैं जिनको यह वरदान प्राप्त है कि जो भी भक्त हनुमान जी की शरण में आएगा उसका कलियुग में कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा।जिन भक्तों ने पूर्ण भाव एवं निष्ठा से हनुमान जी की भक्ति की है, उनके कष्टों को हनुमान जी ने शीघ्र ही दूर किया है। हनुमान भक्तों को जीवन में कभी भी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता उनके संकटों को हनुमान जी स्वयं हर लेते हैं।

अष्ट सिद्धि नव निधि का अर्थ क्या है

हनुमानजी को अष्ट सिद्धियां और नव निधियां सूर्यदेव से प्राप्त हुई थीं। हनुमान चालीसा की चौपाई “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता अस बर दीन जानकी माता” के जप की विधि जानने के पहले हम यह जानते हैं कि अष्ट सिद्धि नव निधि क्या है। “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता”। इसका अर्थ ये है कि महावीर हनुमान जी आठ प्रकार की सिद्धि और नौ प्रकार की निधियों को प्रदान करने वाले हैं। श्रीराम भक्त हनुमान को आठ सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान मां जानकी ने दिया था और कहते हैं कि इन्हें संभालने की शक्ति भी केवल महाबली हनुमान में ही थी। दुनिया में सबसे कीमती वस्तुएं हैं- नौ निधियां जिन्हें पा लेने के बाद किसी भी प्रकार के धन और संपत्ति की आवश्यकता नहीं रहती हैं। हनुमानजी के पास आठ प्रकार की सिद्धियां थीं। इनके प्रभाव से वे किसी भी व्यक्ति का रूप धारण कर सकते थे। अत्यंत सूक्ष्म से लेकर अति विशालकाय देह धारण कर सकते थे। जहां चाहे वहां मन की शक्ति से पल भर में पहुंच सकते थे। सिद्धि ऐसी पारलौकिक व आत्मिक शक्तियों को कहा जाता है जो घोर साधना अथवा तपस्या से प्राप्त होती है।

पौराणिक कथा

शास्त्रों के मुताबिक भगवान शिव के 11 रुद्र अवतार हनुमान जी है। उन्हें शिव का अंश माना जाता है। कहा जाता है एक समय था जब त्रिलोक में अत्याचार तेजी से बढ़ता जा रहा था वहीं रावण की अगुवाई में राक्षसों ने आतंक मचा रखा था। इसी को देखते हुए सभी देवी देवताओं और ऋषि-मुनियों ने श्री हरि हर यानी विष्णु और शिव जी से प्रार्थना की थी। तब यह कहा गया था कि वह राम का अवतार लेकर त्रेता युग के अंतिम चरण में आएंगे। उससे पहले श्री हरि की सेवा के लिए महाबली हनुमान के रूप में उन्होंने जन्म लिया। ऐसे में उनके पिता वनराज केसरी और माता अंजना थी। जबकि पवनदेव हनुमानजी के दत्‍तक पिता माने गए हैं।

वहीं माता रूपी सीता जी का हरण रावण ने किया था तो राम, लक्ष्मण दोनों भाई उनकी खोज में वन में भटक गए थे। ऐसे में दोनों भाइयों पर वनराज सुग्रीव के गुप्त चरो की नजर पड़ी। उन्हीं के कहने पर हनुमान जी दोनों का भेद जानने के लिए उनके पास साधु बनकर पहुंचे थे। यही वक्त था जब पहली बार श्री राम और हनुमान जी का मिलन हुआ था। उसके बाद हनुमान जी ने लंका पहुंचकर सीता जी से भेंट की थी। इसके लिए सीता जी ने हनुमान जी की खूब प्रशंसा की और उन्हें अष्ट सिद्धि और नव निधि का दाता बना दिया । यही वाक्य हनुमान चालीसा की चौपाई में भी बोला जाता है।

हनुमान जी की अष्ट सिद्धियाँ

हिन्दू धर्म में अनेक प्रकार की सिद्धियों का वर्णन है किन्तु उसमे से 8 सिद्धियाँ सर्वाधिक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिनके पास ये सभी सिद्धियाँ होती हैं वो अजेय हो जाता है। इन सिद्धियों को एक श्लोक से दर्शाया गया है : – “अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा। प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः।।” अर्थात: अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व – ये 8 सिद्धियाँ “अष्टसिद्धि” कहलाती हैं। आइये इसे थोड़ा विस्तार में समझते हैं :-

1. अणिमा : – इस सिद्धि की मदद से साधक अणु के समान सूक्ष्म रूप धारण कर सकता है। अपनी इसी शक्ति का प्रयोग कर हनुमान ने लंकिनी नामक राक्षसी से बचकर लंका में प्रवेश किया था। इसी शक्ति द्वारा हनुमान अतिसूक्ष्म रूप धारण कर सुरसा के मुख में जाकर बाहर आ गए।

अहिरावण की यज्ञशाला में प्रवेश करने के लिए भी हनुमानजी ने इस शक्ति का उपयोग किया था। इस सिद्धि के बल पर हनुमानजी कभी भी अति सूक्ष्म रूप धारण कर सकते हैं। रामायण में कई स्थान पर हनुमान ने अणिमा के बल पर अलग-अलग आकार धारण किये।

2. महिमा : – इस सिद्धि के बल पर साधक विशाल रूप धारण कर सकता है। अपनी इसी शक्ति के बल पर हनुमान जी ने सुरसा के समक्ष अपना आकर एक योजन बड़ा कर लिया था। माता सीता को अपनी शक्ति का परिचय देने के लिए भी हनुमानजी ने अपना आकार बहुत विशाल बना लिया था। लंका युद्ध में कुम्भकर्ण से युद्ध करने के लिए हनुमान ने अपना आकर उसी का समान विशाल कर लिया था।

जब लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी को हनुमान पहचान नहीं पाए तो इसी सिद्धि के बल पर उन्होंने विशाल रूप धर कर पूरे पर्वत शिखर को उखाड़ लिया था। महाभारत में भी भीम और अर्जुन का घमंड तोड़ने के लिए हनुमानजी ने अपना विराट स्वरुप इसी शक्ति के बल पर धरा था। इसी सिद्धि से हनुमान ने बचपन में सूर्य को निगल लिया था।

3. गरिमा : – इस सिद्धि से साधक अपना भार बहुत बढ़ा सकता है। इसमें उनका रूप तो सामान्य ही रहता है किन्तु उनका भार किसी पर्वत की भांति हो जाता है। इसी सिद्धि के बल पर हनुमान ने अपनी पूछ का भार इतना बढ़ा लिया था कि भीम जैसे महाशक्तिशाली योद्धा भी उसे हिला नहीं सके। लंका युद्ध में भी ऐसे कई प्रसंग हैं जब कई राक्षस मिल कर भी हनुमान को डिगा नहीं सके।

4. लघिमा : – इस सिद्धि से साधक अपने शरीर का भार बिलकुल हल्का कर सकता है। इसी सिद्धि के बल पर हनुमान रोयें के सामान हलके हो जाते थे और पवन वेग से उड़ सकते थे। रामायण में भी ऐसा वर्णन है कि जब हनुमान अशोक वाटिका पहुँचे तो जिस वृक्ष के नीचे माता सीता थी उसी वृक्ष के एक पत्ते पर हनुमान इस सिद्धि के बल पर बैठ गए। कहा जाता है कि हनुमान की इसी सिद्धि के कारण उनके द्वारा श्रीराम लिखने पर पत्थर इतने हलके हो गए कि समुद्र पर तैरने लगे और फिर उसी सेतु से वानर सेना ने समुद्र को पार किया।

5. प्राप्ति : – इस सिद्धि की सहायता से साधक किसी भी वस्तु को तुरंत ही प्राप्त कर सकता है। अदृश्य होकर बे रोकटोक कही भी आ जा सकता है और किसी भी पशु-पक्षी की भाषा समझ सकता है। रामायण में हनुमानजी की इस शक्ति के बारे में बहुत अधिक उल्लेख है। कहते हैं इसी सिद्धि के बल पर हनुमान ने माता सीता की खोज की थी। उस दौरान उन्होंने माता सीता की थाह लेने के लिए कई पशु-पक्षियों से बात की थी।

6. प्राकाम्य : – इस सिद्धि की सहायता से साधक की कोई भी इच्छित वस्तु चिरकाल तक स्थाई रहती है। इसी सिद्धि के कारण हनुमान चिरंजीवी हैं और कल्प के अंत तक अजर-अमर रहने वाले हैं। इस सिद्धि से वो स्वर्ग से पाताल तक कही भी जा सकते हैं और थल, नभ एवं जल में इच्छानुसार जीवित रह सकते हैं। भगवान श्रीराम की भक्ति भी हनुमान को चिरकाल तक इसी सिद्धि के बल पर प्राप्त है।

7. ईशित्व : – इस सिद्धि की सहायता से साधक अद्वितीय नेतृत्व क्षमता प्राप्त करता है और देवतातुल्य हो जाता है। जिसके पास ये सिद्धि होती है उसे देवपद प्राप्त हो जाता है। यही कारण है कि महाबली हनुमान को एक देवता की भांति पूजा जाता है और इसी सिद्धि के कारण उन्हें कई दैवीय शक्तियाँ प्राप्त है। हनुमान की नेतृत्व क्षमता के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। इसी नेतृत्व के बल पर हनुमान ने सुग्रीव की रक्षा की, श्रीराम से उनकी मित्रता करवाई और लंका युद्ध में पूरी वानर सेना का मार्गदर्शन किया।

8. वशित्व : – इस सिद्धि की सहायता से साधक किसी को भी अपने वश में कर सकता है। साथ ही साथ साधक अपनी सभी इन्द्रियों को अपने वश में रख सकता है। इसी सिद्धि के कारण पवनपुत्र जितेन्द्रिय है और ब्रह्मचारी होकर अपने मन की सभी इच्छाओं को अपने वश में रखते हैं। इसी सिद्धि के कारण हनुमान किसी को भी अपने वश में कर सकते थे और उनसे अपनी बात मनवा सकते थे।

हनुमान जी की नौ निधियाँ – नव निधि

पवनपुत्र हनुमान जी को अष्ट सिद्धि और नौ निधियों का स्वामी कहा गया है। निधि का अर्थ धन अथवा ऐश्वर्य होता है। ऐसी वस्तुएं जो अत्यंत दुर्लभ होती हैं, बहुत ही कम लोगों के पास रहती हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए घोर तप करना होता हो, उन्हें ही निधि कहा जाता है। वैसे तो ब्रह्माण्ड पुराण एवं वायु पुराण में कई निधियों का उल्लेख किया गया है किन्तु उनमे से नौ निधियाँ मुख्य होती हैं। कुबेर के पास भी नौ निधियां हैं पर वो इन्हें किसी दूसरे को देने में असमर्थ हैं। कुबेर की नौ निधियां हैं - पद्य, महापद्य, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और खर्व। कहा जाता है कि हनुमान जी को ये नौ निधियाँ माता सीता ने वरदान स्वरुप दी थी। आइए जानते हैं नवनिधि के बारे में :-

नौ निधि क्या हैं?
* पद्मनिधि : – पद्मनिधि गुणों से संपन्न व्यक्ति सात्विक होता है और सोना-चांदी आदि इकट्ठा करके दान करता है।
* महापद्म निधि : – महापा निधि द्वारा लक्षित व्यक्ति अपने एकत्रित धन आदि को धार्मिक लोगों को दान कर देता है।
* नील निधि : – नील निधि से सुशोभित व्यक्ति सात्त्विक तेज से युक्त होता है। उनकी संपत्ति तीन पीढ़ियों तक चलती है।
* मुकुंद निधि : – जो व्यक्ति मुकुंद निधि के निशाने पर होता है वह रजोगुण से संपन्न होता है, वह राज्य की वसूली में लगा रहता है.
* नंद निधि : – नंद निधि वाला व्यक्ति रजस और तमस गुणों वाला होता है, वही परिवार का आधार होता है।
* मकर निधि: मकर राशि का धनी व्यक्ति शस्त्र संग्रहकर्ता होता है।
* कच्छप निधि : – कच्छप निधि का लक्ष्य व्यक्ति तमस गुण का होता है, वह अपने धन का स्वयं उपभोग करता है।
* शंख निधि : – शंख निधि एक पीढ़ी के लिए होती है।
* खारवा निधि : – खारवा निधि वाले व्यक्ति के स्वभाव में मिश्रित फल देखने को मिलता है।

1. रत्न-किरीट : – किरीट का अर्थ होता है मुकुट। हनुमान का मुकुट अद्भुत और बहुमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ है। इसके समान मूल्यवान और ऐश्वर्यशाली मुकुट संसार में किसी के पास भी नहीं है। औरों का क्या कहें, यहाँ तक कि स्वर्ग और देवताओं के राजा इंद्र का भी मुकुट इससे अधिक मूल्यवान नहीं है।

2. केयूर : – केयूर ऐसा आभूषण होता है जो पुरुष अपनी बाँहों में पहनते हैं। इसे ही भुजबंध या बाहुबंध कहते हैं। हनुमानजी दोनों हाथों में बहुमूल्य स्वर्ण के केयूर पहनते हैं। केयूर केवल आभूषण ही नहीं अपितु युद्ध में महाबली हनुमान के लिए सुरक्षा बंधन का भी कार्य करते हैं।

3. नूपुर : – नूपुर पैरों में पहना जाने वाला एक आभूषण है। बजरंगबली रत्नों से जड़े बहुमूल्य और अद्वितीय नूपुर अपने दोनों पैरों में पहनते हैं। हालाँकि नारियों के नूपुर और पुरुषों के नूपुर में अंतर होता है। नारियां सामान्यतः अपने पैरों में जो नूपुर पहनती हैं उसे ही आज हम घुंघरू के नाम से जानते हैं। इसके उलट पुरुषों के नूपुर ठोस स्वर्ण धातु के बने होते हैं। बजरंगबली के नूपुरों से निकलने वाली आभा से उनके शत्रु युद्धक्षेत्र में नेत्रहीनप्रायः हो जाते हैं।

4. चक्र : – जब भी हम चक्र की बात करते हैं तो हमें भगवान विष्णु अथवा श्रीकृष्ण याद आते हैं। किन्तु आप लोगों को ये जानकर आश्चर्य होगा कि पुराणों में हनुमानजी के चक्र का भी वर्णन आता है। कई चित्रों में आपको चक्रधारी हनुमान दिख जायेंगे। राजस्थान के अलवर में चक्रधारी हनुमान का मंदिर है। जगन्नाथपुरी में तो अष्टभुज हनुमान की मूर्ति है जिनमे से 4 भुजाओं में वे चक्र धारण करते हैं।

5. रथ : – रथ योद्धाओं का सर्वश्रेष्ठ शस्त्र माना जाता है और इसी के आधार पर योद्धाओं को रथी, अतिरथी, महारथी इत्यादि श्रेणियों में बांटा जाता है। हनुमान भी दिव्य रथ के स्वामी हैं जिस पर रहकर युद्ध करने पर उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता।

हालाँकि रामायण के लंका युद्ध ने हनुमान के रथ के विषय में अधिक जानकारी नहीं दी गयी है क्यूंकि वे भी अन्य वानरों की भांति पदाति ही लड़े थे। इसके अतिरिक्त हनुमान इतने शक्तिशाली हैं कि किसी को परास्त करने के लिए उन्हें किसी रथ की आवश्यकता नहीं है। महाभारत में भी श्रीकृष्ण के अनुरोध पर हनुमान अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठे थे।

6. मणि : – मणि कई प्रकार की होती है और पुराणों में नागमणि, पद्म, नीलमणि इत्यादि का वर्णन आया है। हनुमान संसार की सबसे बहुमूल्य मणियों के स्वामी हैं। महाभारत में द्युतसभा में युधिष्ठिर ने अपने पास रखे धन का वर्णन किया था किन्तु उस समस्त धन का मूल्य भी हनुमान की मणियों के समक्ष कम है।

7. भार्या : – वैसे तो हनुमानजी को बाल ब्रह्मचारी कहा जाता है किन्तु पुराणों में हनुमान की पत्नी सुवर्चला का वर्णन आता है। सुवर्चला सूर्यनारायण की पुत्री थी और सूर्यदेव से शिक्षा प्राप्त करने के समय हनुमान ने उनकी पुत्री से विवाह किया था। कुछ ऐसी शिक्षा थी जो केवल गृहस्थ व्यक्ति को ही दी जा सकती थी। जब सूर्यदेव ने हनुमान को उनके ब्रह्मचर्य के कारण उन विद्याओं को प्रदान करने से मना कर दिया, तब विवश होकर हनुमान को विवाह करना पड़ा ताकि वे सूर्यदेव से पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकें।

8. गज : – गज वैसे तो प्राणी है किन्तु उसकी गिनती दुर्लभ निधियों में भी होती है। श्रीगणेश के धड़ पर महादेव ने गज का मुख लगा कर उन्हें जीवित किया। समुद्र मंथन से प्राप्त हुई दुर्लभ निधियों में एक गजराज ऐरावत भी था। गज को गौ, सर्प और मयूर के साथ हिन्दू धर्म के 4 सबसे पवित्र जीवों में से एक माना जाता है। हनुमान की गज निधि को उनके बल के रूप में देखा जाता है। हनुमान में असंख्य हाथियों का बल है और उनका बल ही उनकी निधि है और उस निधि में संसार में कोई और उनसे अधिक संपन्न नहीं है।

9. पद्म : – पद्म निधि के लक्षणों से संपन्न मनुष्य सात्विक गुणयुक्त होता है, तो उसकी कमाई गई संपदा भी सात्विक होती है। सात्विक तरीके से कमाई गई संपदा पीढ़ियों को तार देती है। इसका उपयोग साधक के परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। सात्विक गुणों से संपन्न व्यक्ति स्वर्ण-चांदी आदि का संग्रह करके दान करता है। यह सात्विक प्रकार की निधि होती है जिसका अस्तित्व साधक के परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहता है।

हनुमान जी अपने भक्तों को देते हैं अष्ट सिद्धि एवं नव निधि

हनुमान चालीसा की चौपाई की खास बात यह है कि इसका निरंतर जप करने से हनुमान जी अपने भक्तों को अष्ट सिद्धि नव निधि प्रदान करते हैं। यहां एक बात गौर करने वाली है कि हनुमान जी के अलावा देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के पास भी नौ निधियाँ हैं जो मूलतः धन मापन के लिए भी इस्तेमाल की जाती थी। तो इस प्रकार हनुमान और कुबेर दोनों नौ निधियों के स्वामी हैं किन्तु उनमे अंतर ये है कि कुबेर वो निधियाँ किसी को प्रदान नहीं कर सकते किन्तु हनुमान इसे योग्य व्यक्ति को प्रदान कर सकते हैं। इसी लिए हनुमान को अष्ट सिद्धि और नौ निधि का दाता कहा गया है।

हनुमान चालीसा की चौपाई का इस प्रकार करें जप

Asht Siddhi navnidhi Ke data as var din Janki Mata | हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने के लिए एवं अष्ट सिद्धि एवं नव निधि का वरदान पाने के लिए मंगलवार, गुरुवार एवं शनिवार के दिन प्रातः काल हनुमान जी के मंदिर में जाएं यहां पर सर्वप्रथम धूपबत्ती लगाएं। भूलकर भी हनुमान जी के समक्ष अगरबत्ती का प्रयोग ना करें। धूपबत्ती लगाने के पश्चात तेल या घी का दीपक लगाएं। दीपक में चार बत्ती चारों दिशाओं की ओर लगाएं। दौरान यह ध्यान रहे कि कुश के आसन पर ही बैठे। आसन पर बैठकर 11 – 21 या 51 बार हनुमान चालीसा की चौपाई “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता अस बर दीन जानकी माता” का जप करें। इस विधि से 11 मंगलवार तक यह करें, तो महावीर हनुमान जी की कृपा प्राप्त होगी।



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