शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

इन लोगों को कभी नहीं छूने दें अपना पैर

इन लोगों को कभी नहीं छूने दें अपना पैर

भारतीय संस्कृति में अपने से किसी भी बड़ों का पैर छूना बहुत अच्छा माना जाता है। पैर छूना सिर्फ एक क्रिया नहीं है बल्कि एक पूरा कर्म विधान है। इससे विनम्रता का भाव भी झलकता है। चरण स्पर्श का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। हिंदू धर्म में पैर छूने का इतना महत्व है कि हमारे यहां मां और गुरु के चरण स्पर्श को उनके प्रति आस्था और श्रद्धा का प्रतीक माना गया है। पैर छूने की प्रक्रिया जितनी आस्था और विश्वास से जुड़ी हुई है उतनी ही हिंदू धर्म के मान्यताओं से भी जुड़ी हुई है। हिंदू धर्म के अनुसार इन लोगों को कभी भी अपना पैर नहीं छूने देना चाहिए। इससे दरिद्रता बढ़ती है, इसलिए इसके बारे में आपको भी जानना चाहिए।

श्मशान घाट से लौटते हुए व्यक्ति
हिंदू धर्म यह माना जाता है कि श्मशान घाट से आए हुए व्यक्ति को किसी को भी अपना पैर नहीं छूने देना चाहिए। भले ही पैर छूने वाला इंसान आपसे बहुत छोटा हो या आपसे नीचे पद पर काम करता हो। ऐसा करने से खुद का नुकसान होता है। शास्त्रों में भी अंतिम संस्कार से लौटने पर व्यक्ति के पैर छूना अशुभ माना जाता है। अगर आप अशुद्ध हैं, शौच की अवस्था में हैं, श्मसान घाट से आए हैं तो किसी के पैर न छुएं इससे उल्टा प्रभाव पड़ता है

कुंवारी कन्या
हिंदू धर्म में, मान्यता है कि कन्या को देवी का स्वरूप माना गया है। ऐसे में कुंवारी कन्या को अपना पांव नहीं छूने देना चाहिए। अगर कुंवारी कन्या आपका पैर छू रही है या पैर छूने आए तो उसे रोक दिया करें। अगर कोई कुंवारी कन्या आपके पैर छूती है तो आप पाप के भागी बन सकते हैं। इससे व्यक्ति को दोष लगता है ऐसा करने पर इसका उल्टा प्रभाव घर पर देखने मिलता है

मंदिर में किसी और के पैर
मंदिर को देवी-देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। यह माना जाता है कि मंदिर में किसी और के पैरों को छूने से मंदिर की पवित्रता भंग हो सकती है और हमें देवी-देवताओं का प्रकोप झेलना पड़ सकता है। इसलिए अगर मंदिर परिसर में कोई आपका पैर छूता है तो उन्हें रोक देना चाहिए। क्योंकि मंदिर भगवान का स्थान होता है और उस परिसर में किसी और का पांव छूना उसका अपमान माना जाता है। मंदिर ईश्वर का स्थान है, यहां देवी-देवता से बड़ा किसी को नहीं माना जाता है

पूजा कर रहे व्यक्ति के पैर
जब कोई व्यक्ति पूजा कर रहा होता है, तो उस समय वह देवी-देवताओं से जुड़ा होता है। ऐसे समय में किसी भी इंसान को इस बात का ध्यान देना चाहिए कि कोई उनका पैर न छुए। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि पूजा करते समय किसी भी व्यक्ति का पैर छून से पूजा सफल नहीं होती है और पूजा में बाधा आती है। 

सो रहे इंसान के पैर न छुएं

जब कोई व्यक्ति सो रहा हो तब उसके पैर नहीं छूना चाहिए. इसे अशुभ माना गया है कहा जाता है जीवित व्यक्ति निद्रा में हो और उसके पैर छूने पर उसकी उम्र घटती है वैदिक शास्त्रों के अनुसार लेटे हुए व्यक्ति के पैर केवल एक ही स्थिति में स्पर्श किए जा सकते हैं, जब उसकी मृत्यु हो चुकी हो।

भांजा-भांजी को पैर नहीं छूने देना चाहिए
हिन्दू धर्म के अनुसार भांजा या भांजी मान माने जाते हैं यानी वो सम्मान के पात्र होते हैं। कहते है 1 भांजा या भांजी 100 ब्राह्मणों के बराबर होता है। हिंदू धर्म में ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है ऐसे में भांजा या भांजी को अपने मामा-मामी के पैर नहीं छून चाहिए। इससे सामने वाला पाप का भागी बनता है, मान्यता अनुसार उनका सौभाग्य दुर्भाग्य में बदल सकता है

पौराणिक कथा के मुताबिक भांजे को कभी भी मामा के पैरों का स्पर्श नहीं करना चाहिए। कहते हैं कि जब श्रीकृष्ण जी ने कंस का उद्धार किया है, पैर छूने की यह परंपरा तभी से चली आ रही है, जिसे उचित नहीं माना गया है।

बेटियों को पैर न छूने दें
घर की बेटियों को देवी का स्वरूप माना जाता है। इसलिए हिन्दू धर्म की मान्यताओं के आधार पर बेटियों या कन्याओं को पैर नहीं छूने देने चाहिए।


सोमवार, 4 मई 2026

गोबेकली टेप (Göbekli Tepe)

दुनिया का सबसे पुराना, 11,600 वर्ष पुराना मंदिर, भारत में नहीं, बल्कि, मुस्लिम देश तुर्की के 'गोबेकली टेपे' स्थान पर - World's Oldest Temple at Gobekli Tepe, Turkey :

दुनिया का सबसे पुराना मंदिर तुर्की के दक्षिण-पूर्वी उरफा शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर, सीरिया की सीमा के पास, 'गोबेकली टेपे' स्थान पर है। 'गोबेकली टेपे' को "पॉटबेली हिल" या "नाभि की पहाड़ी" भी कहा जाता है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह मंदिर 11,600 साल पुराना है। यहां एक स्तंभ 15 मीटर ऊंचा और 8 हेक्टेयर चौड़ा है, जो अन्य छोटी इमारतों और खदानों से घिरा हुआ है। भारत को सबसे अधिक मंदिरों का देश कहा जाता है, यहां लगभग 6.50 लाख मंदिर हैं। यह उस समय का है जब पृथ्वी पर धातु के औजार और मिट्टी के बर्तन विकसित नहीं हुए थे।

गोबेकली टेपे एक पथरीले पहाड़ पर बनी हुई स्मारक है। हालांकि, हाल के निष्कर्ष बताते हैं कि यहां कुछ लोग रहते थे, जो मूर्तियां बनाकर अपने देवताओं की पूजा करते थे। यहां स्थित कई स्तंभों को कपड़ों और जंगली जानवरों की नक्काशी से सजाया गया था।

इस मंदिर का पहला सर्वेक्षण 1963 में किया गया था। इसके बाद 1994 में जर्मन पुरातत्वविद् क्लाउस श्मिड्ट ने इसकी महत्ता को पहचानते हुए खुदाई शुरू की। लेकिन 2014 में उनकी मृत्यु के बाद भी खुदाई कार्य जारी रहा। 2018 में Göbeklitepe को UNESCO विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित किया गया। 

यह किस धर्म के लोगों ने बनाया, इसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहना कठिन है। जो अवशेष मिले हैं, उनसे किसी का आकर स्पष्ट नहीं है। हालाँकि, टूटी हुई मूर्तियों को देख कर, कुछ का दावा है, कि इन में से एक भगवान शिव की टूटी मूर्ति और एक अन्य शेर के निशान वाली मूर्ति है। 

"दुनिया का पहला मंदिर" के रूप में प्रसिद्ध है गोबेकली टेप

गोबेकली टेप (Göbekli Tepe) एक ऐसी साइट है, जिसके महत्व को हाल ही में पहचाना गया है। भले ही हाइपोगियम (Hypogeum) को सबसे प्राचीन माना जाता हो, लेकिन गोबेकली टेप सबसे आदिम या प्रारंभिक स्थल है। यह अब तक खोजी गई सबसे पुरानी मानव निर्मित संरचना है। यह स्थल बीस वृत्तीय संरचनाओं से बना हुआ है, जो एक पहाड़ी की चोटी पर फैला है। आज जो अवशेष बचे हैं, वे बड़े चूना पत्थर के खंभे हैं जिन्हें नक्काशीदार जानवरों के अमूर्त डिजाइनों से सजाया गया है। अब तक सांप, बिच्छू, पक्षी, सूअर, लोमड़ियों और शेरों के चित्रण सामने आए हैं। खंभों को पास की एक खदान में खोजा गया है, जहां अधूरे स्तंभ अभी भी देखे जा सकते हैं। हालांकि इस स्थल को निश्चित रूप से धार्मिक प्रकृति का नहीं कहा जा सकता है, लेकिन यह निश्चित रूप से दिलचस्प है। यह साइट दसवीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व की है। यह अभी तक ज्ञात किसी भी सभ्यता से पहले की साइट है। यदि यह एक मंदिर है तो निश्चित रूप से यह अब तक का सबसे पहला मंदिर होगा। इस साइट का उपयोग पहली बार नवपाषाण काल की शुरूआत में किया गया था, जो दक्षिण पश्चिम एशिया (Asia) में दुनिया में कहीं भी सबसे पुरानी स्थायी मानव बस्तियों की उपस्थिति का प्रतीक है।

प्रागितिहासवादी इस नवपाषाण क्रांति को कृषि के आगमन से जोड़ते हैं, लेकिन इस बात से असहमत हैं कि खेती के कारण लोग यहां बसे या यहां बसने के कारण उन्होंने खेती की। गोबेकली टेप, जो कि एक स्मारक परिसर है तथा चट्टानी पर्वत की चोटी पर निर्मित है, पानी के ज्ञात स्रोतों से बहुत दूर है तथा यहां आज तक कृषि उत्पादन का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है। इन कारणों की वजह से यह स्थल बहस का विषय बना हुआ है। साइट के मूल उत्खनक, जर्मन पुरातत्वविद् क्लॉस श्मिट (Klaus Schmidt) ने इसे "दुनिया का पहला मंदिर" के रूप में वर्णित किया है।



गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

देवव्रत महेश रेखे

देवव्रत महेश रेखे : 19 साल का वो तपस्वी, जिसने 200 साल बाद काशी में दोहराया इतिहास, पीएम-सीएम भी मुरीद

Devvrat Mahesh Rekhe : काशी में 19 वर्षीय देवव्रत महेश रेखे ने 200 साल बाद 'दंडक्रम पारायण' कर इतिहास रचा। 50 दिनों की इस कठिन साधना पर पीएम मोदी और सीएम योगी ने भी दी बधाई।

बिना किसी किताब को देखे, बिना रुके, लगातार 50 दिनों तक हजारों कठिन संस्कृत मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करना आज के दौरान में किसी के लिए असंभव सा लगता है, पर 19 वर्ष के एक युवक ने इसे सच कर दिखाया। महाराष्ट्र के एक 19 वर्षीय युवा देवव्रत महेश रेखे ने वह कर दिखाया है जो पिछले 200 वर्षों में किसी ने नहीं किया। उनकी इस कठिन 'साधना' ने न केवल काशी के विद्वानों को चौंका दिया, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी उनका मुरीद बना दिया।

कौन हैं देवव्रत महेश रेखे?

देवव्रत महेश रेखे मूल रूप से महाराष्ट्र के अहिल्या नगर के रहने वाले हैं। महज 19 वर्ष की आयु में उन्होंने वेदों के प्रति वह समर्पण दिखाया है जो बड़े-बड़े विद्वानों के लिए भी दुर्लभ है। देवव्रत वर्तमान में वाराणसी (काशी) के रामघाट स्थित वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय के छात्र हैं। देवव्रत एक वैदिक परिवार से आते हैं। उनके पिता वेदब्रह्मश्री महेश चंद्रकांत रेखे स्वयं एक प्रतिष्ठित वैदिक विद्वान हैं और उन्होंने ही देवव्रत को इस कठिन मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित किया है।

क्या है 'दंडक्रम पारायण साधना' जिसकी हर तरफ चर्चा?

देवव्रत ने जिस उपलब्धि को हासिल किया है, उसे वैदिक शब्दावली में 'दंडक्रम पारायण' कहा जाता है। यह वेदों के पाठ की सबसे जटिल विधियों में से एक है। यह पाठ शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा से संबंधित है। इसमें करीब 2,000 मंत्र शामिल हैं। इसके पाठ के नियम भी कठिन हैं। देवव्रत को बिना किसी ग्रंथ को देखे (कंठस्थ), पूरी शुद्धता और लय के साथ इन मंत्रों का उच्चारण करना था, और उन्होंने इसे कर दिखाया। यह अनुष्ठान लगातार 50 दिनों तक चला। उन्होंने 2 अक्तूबर से 30 नवंबर तक बिना किसी बाधा के इस उपलब्धि हो हासिल किया।  30 नवंबर को दंडक्रम पारायण की पूर्णाहुति के बाद उन्हें शृंगेरी शंकराचार्य ने सम्मान स्वरूप सोने का कंगन और 1,01,116 रुपये दिया गया। दंडक्रम पारायणकर्ता अभिनंदन समिति के पदाधिकारियों चल्ला अन्नपूर्णा प्रसाद, चल्ला सुब्बाराव, अनिल किंजवडेकर, चंद्रशेखर द्रविड़ घनपाठी, प्रो. माधव जर्नादन रटाटे व पांडुरंग पुराणिक ने बताया कि नित्य साढ़े तीन से चार घंटे पाठ कर देवव्रत ने इसे पूरा किया।

देवव्रत महेश रेखे की उपलब्धि क्यों 'ऐतिहासिक'?

देवव्रत की उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका इतिहास है।  ऐसा माना जाता है कि 'दंडक्रम पारायण' का यह कठिन स्वरूप पिछले 200 वर्षों में किसी ने पूर्ण नहीं किया था। इससे पहले, लगभग दो सदी पूर्व नासिक के वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने यह उपलब्धि हासिल की थी। आज के डिजिटल दौर में, जब याददाश्त पर तकनीक हावी है, एक 19 साल के युवा द्वारा हजारों मंत्रों को कंठस्थ करना और उन्हें त्रुटिहीन सुनाना एक चमत्कार जैसा है। देवव्रत की इस सिद्धि ने देश के शीर्ष नेतृत्व का ध्यान अपनी ओर खींचा।

पीएम मोदी और सीएम योगी ने क्या दी प्रतिक्रिया?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर देवव्रत की प्रशंसा करते हुए लिखा, "19 वर्ष के देवव्रत महेश रेखे जी ने जो उपलब्धि हासिल की है, वो जानकर मन प्रफुल्लित हो गया है। उनकी ये सफलता हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बनने वाली है... काशी से सांसद होने के नाते मैं विशेष रूप से आनंदित हूं।"

उनकी उपलब्धि पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के 'दंडक्रम पारायणम्' का 50 दिनों तक अखंड, शुद्ध और पूर्ण अनुशासन के साथ पाठ करना हमारी प्राचीन गुरू-परंपरा के गौरव का पुनर्जागरण है। उन्होंने इसे भारतीय वैदिक परंपरा की शक्ति और अनुशासन का जीवंत उदाहरण बताया। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि यह महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान पवित्र काशी की धरती पर सम्पन्न हुआ। सीएम ने देवव्रत रेखे के परिवार, आचार्यों, संत-मनीषियों और उन सभी संस्थाओं का अभिनंदन भी किया, जिनके सहयोग से यह महान तपस्या सफल हो सकी।


शनिवार, 8 नवंबर 2025

पंजुर्ली देव और गुलिगा देव

पंजुरली और गुलिगा देव और भूटा कोला के बारे में जानें

पंजुरली देव दक्षिण भारत में, खासकर कर्नाटक और केरल के कुछ हिस्सों में पूजे जाते हैं। उनकी किंवदंतियाँ वहाँ बहुत प्रचलित हैं, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में उनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। तो आइए जानते हैं इसके बारे में कुछ।

भगवान विष्णु का वराह अवतार

पंजुरली शब्द तुलु शब्द "पंजिदा कुर्ले" का अपभ्रंश है। तुलु भाषा में इसका अर्थ है "युवा सूअर"। यह कुछ हद तक भगवान विष्णु के वराह अवतार जैसा है। तुलु लोगों में, जिन्हें तुलुनाडु भी कहा जाता है, पंजुरली देव सबसे प्राचीन देवताओं में से एक हैं। ऐसी मान्यता है कि पंजुरली देव उसी समय पृथ्वी पर आए थे जब पृथ्वी पर पहली बार भोजन की उत्पत्ति हुई थी, अर्थात मानव सभ्यता के आरंभ में।

कुछ विद्वानों का यह भी मानना ​​है कि जब मानव ने खेती करना सीखा, उस समय जंगली सूअर (वराह) उनकी फसलों को खाकर अपना पेट भरते थे। उन्होंने इसे कोई दैवीय शक्ति समझकर अपनी फसलों की रक्षा के लिए वराह रूप में पंजुरली देव की पूजा शुरू कर दी। तब से पंजुरली देव की पूजा की जाती है।

आज भी, पंजुरली देव की पूजा करते समय, लोग " बार्ने-कोरपुनी " नामक एक अनुष्ठान करते हैं जिसमें देवता को भोग लगाया जाता है। इस अनुष्ठान में, एक बाँस के बर्तन में चावल रखे जाते हैं और नारियल के दो टुकड़ों में एक दीपक जलाकर पंजुरली देवता के सामने रखा जाता है।

इसके बाद पंजुरली देव के सामने "भूत कोला" नामक एक अत्यंत प्राचीन नृत्य किया जाता है। तुलु भाषा में कोला का अर्थ नृत्य होता है और भूत इसी नृत्य का एक रूप है। भूत कोला की तरह कई अन्य प्रकार के नृत्य भी हैं। यह नृत्य काफी देर तक चलता है और जब नृत्य करने वाला थक जाता है, तो लोग उस भोजन को पंजुरली देव को समर्पित करते हैं। यह एक प्रकार से उनसे अपनी फसलों की रक्षा के लिए की गई प्रार्थना है।

पंजुर्ली देव के जन्म की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक सूअर के पाँच पुत्र थे, लेकिन उनमें से एक नवजात शिशु के रूप में पीछे छूट गया। वह भूख-प्यास से तड़पने लगा और मृत्यु के कगार पर खड़ा था। उसी समय माता पार्वती भ्रमण करती हुई वहाँ पहुँचीं और उन्होंने एक नवजात वराह शिशु को देखा। उन्हें उस पर दया आ गई और वे उसे कैलाश ले गईं। वहाँ वे अपने पुत्र की तरह उसका पालन करने लगीं।

समय बीतता गया और उस बालक ने एक क्रूर सूअर का रूप धारण कर लिया। समय के साथ उसकी दाढ़ें (दांत) निकल आईं, जिससे उसे बहुत कष्ट होने लगा। उस खुजली से बचने के लिए उसने धरती की सारी फसलों को नष्ट करना शुरू कर दिया। इससे संसार में अन्न की कमी हो गई और लोग भूख से तड़पने लगे। जब भगवान शंकर ने यह देखा, तो उन्होंने सृष्टि के कल्याण के लिए उस सूअर का वध करने का निश्चय किया।

शिव का श्राप था सूअर के लिए वरदान

जब माता पार्वती को यह बात पता चली तो उन्होंने महादेव से उसके प्राण न लेने की प्रार्थना की। माता की प्रार्थना पर महादेव ने उसका वध तो नहीं किया लेकिन उसे कैलाश से निकालकर पृथ्वी पर जाने का श्राप दे दिया। अपनी जान बचाने के बाद उस सूअर ने महादेव और माता पार्वती से प्रार्थना की और तब भोलेनाथ ने उसे दिव्य शक्ति के रूप में पृथ्वी पर जाकर वहां मनुष्यों और उनकी फसलों की रक्षा करने का आदेश दिया।

तभी से वे वराह "पंजुर्लि" देव के रूप में पृथ्वी पर निवास करने लगे और पृथ्वी पर फसलों की रक्षा करने लगे। इसीलिए लोग उन्हें देवता की तरह पूजने लगे। दक्षिण भारत में अलग-अलग जगहों पर उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। उनके नामों के साथ-साथ उनकी पूजा विधि और रूप भी भिन्न हैं। अधिकांश स्थानों पर उन्हें वराह रूप में ही दिखाया गया है, लेकिन कुछ स्थानों पर उन्हें मुखौटा पहने हुए मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया है।

पंजुर्ली देव की बहन

उनकी एक बहन भी मानी गई है जिसका नाम "कल्लूर्ती" है। मंगलौर के बंटवाल तालुका में इन दोनों का एक प्रसिद्ध मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि यहीं पर कल्लूर्ती की पंजुरली देव से मुलाकात होती है और दोनों भाई-बहन के रूप में पूजे जाते हैं, जिन्हें "कल्लूर्ती-पंजुरली" देवताओं के रूप में एक साथ पूजा जाता है। तुलुनाडु में शायद ही कोई परिवार हो जो कल्लूर्ती पंजुरली देव की पूजा न करता हो।

कल्लूर्ती पंजुर्ली को सभी अपने परिवार का मुखिया मानते हैं। परिवार में जो भी समस्या होती है, उसे इन दोनों के सामने लाना होता है और ये दोनों उस समस्या का समाधान बताते हैं। समाधान जो भी हो, परिवार के सभी सदस्यों को उस पर सहमत होना होता है। ऐसा माना जाता है कि कल्लूर्ती माँ समस्या का समाधान खोजने के लिए सुझाव देती हैं और अंतिम निर्णय पंजुर्ली देव द्वारा लिया जाता है।

गुलिगा देव का जन्म भगवान शिव द्वारा हुआ

पंजुरली देव के साथ एक और देवता “ गुलिगा” का भी वर्णन मिलता है जो देवता का एक उग्र रूप है। एक प्राचीन कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती महादेव के लिए राख लेकर आईं। राख में एक कंकड़ था जिसे भोलेनाथ ने धरती पर फेंक दिया। उसी कंकड़ से गुलिगा देव अपने उग्र रूप में उत्पन्न हुए। उन्होंने महादेव से पूछा कि मैं कहां जाऊं। इस पर भोलेनाथ ने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेज दिया। भगवान विष्णु ने उन्हें “नेनुल्ला संके” के गर्भ में धरती पर भेज दिया।

नौ महीने बाद, गुलिगा देव ने अपनी माँ से पूछा कि वह किस रास्ते से बाहर आए। उसकी माँ ने उसे उसी रास्ते से आने को कहा जिससे सभी बच्चे आते हैं, लेकिन गुलिगा देव ने ऐसा नहीं किया। वह अपनी माँ का पेट फाड़कर बाहर आ गया। वे बहुत भूखे थे इसलिए वे कुछ खाने की तलाश में निकल पड़े। वह इतना भूखा था कि उसने सूर्यदेव को खाने की कोशिश की। फिर उसने मछलियाँ खाईं और जानवरों का खून पिया, लेकिन इससे भी उनकी भूख नहीं मिटी। अंत में, भगवान विष्णु ने उसे अपनी छोटी उंगली खाने को दी जिससे उसकी भूख शांत हुई।

गुलिगा देव शिवगण हैं

गुलिगा देव को भी शिवगणों में से एक माना जाता है और इन्हें क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार पंजुरली देव और गुलिगा देव के बीच कई दिनों तक युद्ध चला। तब माँ दुर्गा ने उस युद्ध को रुकवाकर दोनों को साथ रहने का आदेश दिया। इसी कारण आज भी पंजुरली देव और गुलिगा देव की पूजा एक साथ की जाती है। पंजुरली देव जहाँ सौम्य हैं, वहीं गुलिगा देव उग्र हैं, लेकिन फिर भी दोनों शांतिपूर्वक एक साथ रहते हैं।

भूटा कोला

तुलु भाषा में, भूत का अर्थ है दिव्य शक्ति और कोला का अर्थ है नृत्य। इसे दैव कोला भी कहा जाता है। भूत कोला के साथ "दैव नेमा" शब्द का भी प्रयोग होता है। ऐसा माना जाता है कि भूत कोला में जब नर्तक कई आत्माओं (देवों) से ग्रस्त होता है और उस नृत्य को करने वाले व्यक्ति में कोई आत्मा (भूत) प्रवेश करती है, तो उसे दैव नेमा कहते हैं।

भूत कोला नृत्य पारंपरिक माना जाता है। यानी यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। भूत-कोला नृत्य में निपुण व्यक्ति इसे अपने सबसे योग्य बच्चे को सिखाता है और फिर उसका बेटा भूत-कोला नृत्य करता है। इसके लिए उसे कठोर प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। भूत कोला नृत्य करने के लिए केवल वही व्यक्ति योग्य माना जाता है जिसका मन शुद्ध हो और जिसके शरीर में नृत्य के दौरान कोई देवता या भूत प्रवेश कर सके।


बुधवार, 24 सितंबर 2025

तुम्बुरु गंधर्व

देवताओं के संगीतकार व गायक तुम्बुरु

हिन्दू पौराणिक कथाओं में तुम्बुरु गायकों में सर्वश्रेष्ठ और गंधर्वों के महान संगीतकार हैं। उन्होंने दिव्य देवताओं के दरबार के लिए संगीत और गीतों की रचना की थी। पुराणों में तुम्बरू या तुम्बुरु को ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी प्रभा के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है।

तुम्बरू को अक्सर गंधर्वों में सर्वश्रेष्ठ बताया जाता है। वह देवताओं की उपस्थिति में गाता है। नारद के समान, उन्हें गीतों का राजा भी माना जाता है। प्राचीन पुराणों के अनुसार, नारद को तुम्बुरु का शिक्षक माना जाता है। कहा जाता है कि नारद और तुम्बुरु भगवान विष्णु की महिमा गाते हैं।

अदभुत रामायण में उल्लेख है कि तुम्बरू सभी गायकों में सर्वश्रेष्ठ थे और भगवान विष्णु द्वारा उन्हें पुरस्कृत किया गया था। नारद, एक बार तुम्बरू से ईर्ष्या करने लगे तो विष्णु नारद से कहते हैं कि तुम्बुरु तुम्हारी तुलना में अपने संगीत को अच्छी तरह से निभाते हैं, और तब फिर विष्‍णुीजी नारद को संगीत सीखने के लिए गणबंधु नामक उल्लू के पास भेजते हैं।

उल्लू से सीखने के बाद, नारद तुंबुरु के घर गए, वहां उन्होंने देखा कि तुंबुरू घायल पुरुषों और महिलाओं से घिरा हुआ है, और तब उन्हें पता चलता है कि वे संगीत राग और रागिनियां हैं, जो उनके बुरे गायन से बुरी तरह घायल हो गए थे। नारद शर्मिंदा होकर उस स्थान को छोड़ देते हैं और वे भगवान कृष्ण की पत्नियों से उचित गायन सीखते हैं।

तुंबुरू को कुबेर का अनुयायी बताया गया है और उनके गीत आमतौर पर कुबेर के दरबार में सुने जाते हैं। तुंबुरू या थम्बुरु गंधर्वों को संगीत और गायन सिखाता है और उसे अपने संगीत के लिए "गंधर्वों का स्वामी" कहा जाता है। तुंबुरू को कभी-कभी एक गंधर्व के बजाय एक ऋषि के रूप में भी वर्णित किया गया है।

तुम्बरू को अक्सर घोड़े के मुंह वाले ऋषि के रूप में दर्शाया गया। वे वीणा धारण करते और गाते हैं। अपनी तपस्या से शिव को प्रसन्न करने के बाद, तुम्बुरु ने शिव से कहा कि वे उन्हें एक घोड़ा जैसा चेहरा और अमरता प्रदान करें। शिव ने उसे आशीर्वाद दिया और वह वरदान दिया जो उसने मांगा था।

तिरुमला में तुम्बुरु तीर्थम

एक बार ऋषि तुम्बुरु ने अपनी आलसी पत्नी को एक ताड़ बनने और इस झील में रहने के लिए शाप दिया। कुछ समय बाद, ऋषि अगस्त्य इस तीर्थ में पहुंचे और अपने शिष्यों को इस तीर्थ के गुणों का वर्णन किया। उनकी बातें सुनकर उसने फिर से अपने गंधर्व स्वरूप को प्राप्त कर लिया।

निष्कर्ष:

तुम्बुरु जो एक दिव्य ऋषि और एक महान संगीतकार हैं और वे भगवान शिव एवं भगवान विष्णु के बड़े भक्त हैं। वह हमारी और आपकी इच्छाओं को पूरा करेंगे। वह हमें एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन प्रदान करते हैं। आइए हम उसकी निरंतर पूजा करें, और उसके नाम “ओम श्रीं थुंबुरुवे नमः” का जाप करें।