मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

इलाहाबाद का नाम अब प्रयागराज

इलाहाबाद (Allahabad) से प्रयागराज (Prayagraj)

देश के धार्मिक, शैक्षिक और राजनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण शहर इलाहाबाद को अब प्रयागराज के नाम से जाना जाएगा। लेकिन क्या आपको पता है कि इस शहर का नाम कैसे और क्यों बदला गया ? दरअसल ऐतिहासिक और पौराणिक दोनों ही रूप से प्रयागराज समृद्ध है। इस जिले को ब्रह्मा की यज्ञस्थली के रूप में जाना जाता है। यहां आर्यों ने भी अपनी बस्तियां बसाई थीं। आंकड़ों के मुताबिक 160 साल बाद जिले का नाम इलाहाबाद से प्रयागराज हो रहा है। इसे सभी तीर्थों का राजा, संगम नगरी के नाम से भी ख्याती प्राप्त है।

जानिए प्रयाग से इलाहाबाद और फिर प्रयागराज तक का सफर -

ब्रह्मा
पुराणों में कहा गया है, ''प्रयागस्य पवेशाद्वै पापं नश्यति: तत्क्षणात्।'' अर्थात् प्रयाग में प्रवेश मात्र से ही समस्त पाप कर्म का नाश हो जाता है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने इसकी रचना से बाद प्रयाग में पहला यज्ञ किया था। इसी प्रथम यज्ञ के प्र और याग यानी यज्ञ से मिलकर प्रयाग बना।

कुछ मान्यताओं के मुताबिक ब्रह्मा ने संसार की रचना के बाद पहला बलिदान यहीं दिया था, इस कारण इसका नाम प्रयाग पड़ा। संस्कृत में प्रयाग का एक मतलब 'बलिदान की जगह' भी है। इसके अलावा प्रयाग ऋषि भारद्वाज, ऋषि दुर्वासा और ऋषि पन्ना की ज्ञानस्थली भी है।

पौराणिक महत्व : रामचरित मानस में इसे प्रयागराज ही कहा गया है। इलाहाबाद। संगम के जल से प्राचीन काल में राजाओं का अभिषेक होता था। इस बात का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है। वन जाते समय श्रीराम प्रयाग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम पर होते हुए गए थे। भगवान श्रीराम जब श्रृंग्वेरपुर पहुंचे तो वहां प्रयागराज का ही जिक्र आया। सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक पुराण मत्स्य पुराण के 102 अध्याय से लेकर 107 अध्याय तक में इस तीर्थ के महात्म्य का वर्णन है। उसमें लिखा है कि प्रयाग प्रजापति का क्षेत्र है जहां गंगा और यमुना बहती हैं।

अकबर

अकबरनामा और आईने अकबरी व अन्य मुगलकालीन ऐतिहासिक पुस्तकों के हवाले से बताते हैं कि मुगल बादशाह अकबर आक्रांता था, जिसने भारतीय लोगों को दबाने व डराने के लिए 1574-75 (16वीं सदी) में प्रयागराज का नाम बदलकर इलाहाबास कर दिया, जिसका अर्थ 'जहां अल्लाह का वास होना है'। धीरे-धीरे इलाहाबास का संबोधन इलाहाबाद के रूप में होने लगा। भारतीयों को नीचा दिखाने व अपना प्रभाव देश के अनेक कोनों में फैलाने के लिए उसने संगम तट पर विशाल किला बनवाया। जिसे उनका सबसे बड़ा किला माना जाता है।

*- इसके बाद 1858 में अंग्रेजों के शासन के दौरान शहर का नाम इलाहाबाद रखा गया तथा इसे आगरा-अवध संयुक्त प्रांत की राजधानी बना दिया गया। यही नाम अब सरकारी अभिलेखों में दर्ज है।

*- आजादी की लड़ाई का केंद्र इलाहाबाद ही था। वर्धन साम्राज्य के राजा हर्षवर्धन के राज में 644 CE में भारत आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने अपने यात्रा विवरण में पो-लो-ये-किया नाम के शहर का जिक्र किया है, जिसे इलाहाबाद माना जाता है।

*- उन्होंने दो नदियों के संगम वाले शहर में राजा शिलादित्य (राजा हर्ष) द्वारा कराए एक स्नान का जिक्र किया है, जिसे प्रयाग के कुंभ मेले का सबसे पुराना और ऐतिहासिक दस्तावेज माना जाता है। 

*- वैसे तो इलाहाबाद नाम मुगल शासक अकबर की देन है लेकिन इसे फिर से प्रयागराज बनाने की मांग समय-समय पर होती रही है। 

महामना मदनमोहन मालवीय
महामना मदनमोहन मालवीय ने अंग्रेजी शासनकाल में सबसे पहले यह आवाज उठाई और फिर अनेक संस्थानों ने समय-समय पर मांग दोहराई।

महामना मदनमोहन मालवीय ने 1939 में इलाहाबाद का नाम बदलने की मुहिम छेड़ी थी। उन्होंने जैसे गंगा रक्षा के लिए आंदोलन चलाया था, ठीक उसी प्रकार देश के उन प्रमुख धार्मिक स्थलों का नाम भी बदलने की मुहिम छेड़ी थी, जिन्हें मुगल शासनकाल में बदला गया था। उस दौर में नाम तो नहीं बदला गया, लेकिन महामना के प्रयास से अधिकतर भारतीय अपने शहर की प्राचीनतम पहचान से जुड़ गए थे।

1996 के बाद इलाहाबाद का नाम बदलने की मुहिम पुरजोर तरीके से चली। अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि भी इलाहाबाद का नाम बदलने की मुहिम में आगे आए। प्रयागराज सेवा समिति, भारत भाग्य विधाता, परिवर्तन मानव विकास संस्थान, परिवर्तन संस्था, प्रयाग विद्वत परिषद जैसी संस्थाएं भी हस्ताक्षर अभियान चलाकर इलाहाबाद का नाम बदलने की मांग करती रही हैं।

आजादी के बाद
पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के समक्ष भी इलाहाबाद का नाम बदलने की मांग की गई।

ब्रह्मानंद ने लिखा था नेहरू को पत्र

देश को आजादी मिलने के बाद स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने के लिए 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा था। स्वामी ब्रह्मानंद ने वेद-पुराणों का हवाला देते हुए नेहरू से मांग की थी कि इलाहाबाद को प्रयागराज का नाम देना चाहिए, क्योंकि इससे हिंदुओं की धार्मिक व मानसिक भावनाएं जुड़ी हैं।

इंदिरा से मिले थे हरिचैतन्य

टीकरमाफी आश्रम पीठाधीश्वर स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी ने अक्टूबर 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से हुई मुलाकात में इलाहाबाद का नाम बदलने की मांग की थी। स्वामी हरिचैतन्य बताते हैं कि 'जन्मस्थली होने के चलते इंदिरा का प्रयाग से भावनात्मक जुड़ाव था, इसीलिए उन्होंने मेरी मांग पर उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया था।

वर्तमान में साधू संतों ने सरकार के सामने प्रस्ताव दिया था।

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