कटासराज मन्दिर (Katasraj Temple)
पाकिस्तान के कुछ प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है कटासराज मंदिर जो एक पौराणिक और ऐतिहासिक जगह है। इस मंदिर में स्वयंसंभु शिव का शिवलिंग स्थापित है। कहते हैं कि यहीं यक्ष-युद्धिष्ठिर संवाद हुआ था, और युधिष्ठिर ने यहां की सुंदरता की काफी तारीफ की थी। यहीं देवी सती की अग्नि समाधि के बाद भगवान शिव के आंसू गिरे थे और विश्व प्रसिद्ध रोमां संगीत की उत्पत्ति का क्षेत्र भी यही माना जाता है। कुछ लोगों की ऐसी भी मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान शिव व पार्वती का विवाह हुआ था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव ने सती से शादी के बाद कई साल कटासराज में ही गुजार।
कहां स्थित है कटासराज मंदिर
कटास राज, पाकिस्तान के पाकिस्तानी पंजाब प्रान्त के चकवाल (Chakwal) जिले के उत्तरी भाग में नमक कोह पर्वत शृंखला में स्थित हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। कटासराज मंदिर पाकिस्तान के चकवाल गांव से लगभग 40 कि.मी. की दूरी पर कटस में एक पहाड़ी पर है। यहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर है। यह लाहौर और इस्लामाबाद मोटरवे के ठीक बगल में साल्ट रेंज की मशहूर पहाड़ियों के पास है। यह 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
इस मंदिर का निर्माण छठी शताब्दी से नवीं शताब्दी के मध्य (615 – 950 ईसा) करवाया गया था। ये इतिहास को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त और भी मंदिरों की श्रृंखला है जो दसवीं शताब्दी के बताये जाते हैं।
यहां के सतघरा मंदिरों के समूह में सिर्फ चार मंदिरों के अवशेष बचे हैं जिसमें भगवान शिव, राम और हनुमान के मंदिर हैं। साथ ही यहां पर बौद्ध स्तूप, जैन मंदिरों के अवशेष और सिख धर्म से जुड़े स्थल भी हैं। कहते हैं कि यहां पर सिखों के गुरु नानकदेव और नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक गोरखनाथ भी आए थे।
खास निर्माण शैली
कटासराज की विशिष्ट निर्माण शैली और गुंबद वाली ये बारादरी अन्य मंदिरों के मुकाबले कई सदियों बाद बनाई गई थी। इसलिए इसकी हालत अन्य मंदिरों के मुकाबले में अच्छी है। पुरातत्वविदों के अनुसार कटासराज का सबसे पुराना मंदिर छठी सदी का है। पुरातत्वविद् कहते हैं कि ये मंदि नौ सौ साल तक पुराने हैं।
मूंगे की चट्टानें
कटासराज के मंदिरों और कई अन्य इमारतों में हिस्सों में मूंगे की चट्टानों, जानवरों की हड्डियों और कई पुरानी चीजों के अवशेष भी देखे जा सकते हैं।
कटासराज शब्द की उत्पत्ति
कटासराज शब्द की उत्पत्ति 'कटाक्ष' से मानी जाती है जो सती के पिता दक्ष प्रजापति ने शिव के ऊपर व्यंग्य यानि कटाक्ष किया था। इस वजह से हिंदुओं में इस जगह की खासी प्रतिष्ठा है। महाभारत में इसे द्वैतवन कहा गया है जो सरस्वती नदी के तट पर स्थित था। उस हिसाब से सरस्वती नदी पर शोध करनेवालों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण जगह है।
कटासराज मंदिर की पौराणिक मान्यता
यहां पर गिरे थे शिव के आंसू
इतिहासकारों एवं पुरात्तव विभाग के अनुसार, इस स्थान को शिव नेत्र माना जाता है। पौराणिक काल में भगवान शिव जब सती की अग्नि-समाधि से काफी दुखी हुए थे तो उनके आंसू दो जगह गिरे थेे। एक आंसू कटास पर टपका जहाँ अमृत बन गया यह आज भी महान सरोवर अमृत कुण्ड तीर्थ स्थान कटास राज के रूप में है, दूसरा आंसू अजमेर राजस्थान में टपका और यहाँ पर पुष्करराज तीर्थ स्थान है।
मान्यता थी कि कटासराज के सरोवर में स्नान करने से मनुष्य समस्त रोग व पाप से मुक्त हो जाता है। सरोवर का पानी दो रंग का है - हरा व नीला। सरोवर की कम गहराई पर पानी हरा दिखाई देता है। जहां गहराई ज्यादा है वहां यह नीला है। भगवान शिव के इस मंदिर का प्रतिबिंद मंदिर के पास बने 150 फीट लंबे और 90 फीट चौड़े पवित्र सरोवर के पानी में साफ दिखाई देता है।
क्या है महाभारत से इसका रिश्ता
इसके अतिरिक्त कहा जाता है कि यह मंदिर महाभारत काल (त्रेतायुग) में भी था। इस मंदिर से जुड़ी पांडवों की कई कथाएं प्रसिद्ध हैं। महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के 14 वर्ष के दौरान चार वर्ष इस मंदिर परिसर में बिताए थे। कहा जाता है कि यहां के सात मंदिरों का निर्माण पांडवों ने महाभारत काल में किया था। पांडवों ने अपने रहने के लिए सात भवनों का निर्माण किया था। वहीं भवन अब सात मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
यहीं वह कुण्ड है जहाँ पांडव प्यास लगने पर पानी की खोज में पहुंचे थे। इस कुण्ड पर यक्ष का अधिकार था सर्वप्रथम नकुल पानी लेने गया जब पानी पीने लगा तो यक्ष ने आवाज़ दी की इस पानी पर उसका अधिकार है पीने की चेष्टा मत करो अगर पानी लेना है तो पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो लेकिन वह उसके प्रश्नों का उत्तर न दे सका और पानी पीने लगा। यक्ष ने उसको मूर्छित कर दिया ठीक इसी प्रकार सहदेव, अर्जुन व भीम चारों भाई एक एक करके पानी लेने गये लेकिन कोई भी यक्ष के प्रश्नों का उत्तर न दे सका और फिर भी पानी लेने का प्रयास किया यक्ष ने चारों भाइयों को मूर्छित कर दिया अंत में चारों भाइयों को खोजते हुए युधिष्ठिर कुण्ड के किनारे पहुंचा और चारों भाइयों को मूर्छित पड़े देखा वह बोला की मेरे भाइयों को किसने मूर्छित किया है वह सामने आये, यक्ष आया और उसने कहा कि इन्होने बिना मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए पानी लेना चाहा अत: इनकी यह दुर्दशा हुई अगर तुम ने भी ऐसा व्यवहार किया तो तुम्हारा भी यही हाल होगा।
युधिष्ठिर ने यहीं पर दिए यक्ष को सही जवाब
युधिष्ठिर ने नम्रतापूर्वक कहा की तुम प्रश्न पूछो मैं अपने विवेक से उनका उत्तर दूँगा यक्ष ने कई प्रश्न पूछे उनमे से एक मुख्य प्रश्न था -
कौन प्रसन्न है? आश्चर्य क्या है? मार्ग क्या है? वार्ता क्या है? मेरे चार प्रश्नों का उत्तर दे तो तुम्हारे मृत भाई जीवित हो जायेंगे।
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया -
प्रसन्न : जो व्यक्ति पांचवे छठे दिन घर में स्वादु साग पका ले, जो ऋणी नहीं हो, जो प्रवास में न रहता हो वह प्रसन्न है।
आश्चर्य : प्रतिदिन प्राणी मृत्यु को प्राप्त होते हैं यह सब देखकर भी संसार के प्राणी हमेशा जीवित रहने की कामना करते हैं इससे बदकर आश्चर्य क्या होगा।
मार्ग : तर्क प्रतिष्ठित नहीं होता श्रुतियाँ (वेद) विभिन्न हैं कोई एक ऐसा मुनि नहीं जिसकी बात को प्रामाणिक माना जा सके अत: महापुरूष धर्म के विषय में जिस मार्ग का अनुसरण करें सबके लिए वही मार्ग चलने योग्य है।
वार्ता (समाचार) : महामोह रूपी कड़ाहे में, सूर्य रूपी आग से, रात दिन रूपी (ईंधन) से, मास ऋतु रूपी कड़छी के द्वारा यह काल प्राणियों को भोजन के सामान पका रहा है, यही वार्ता है।
इस प्रकार युधिष्ठिर ने अपने विवेक से यक्ष के सभी प्रश्नों का उत्तर दे दिया और यक्ष ने प्रसन्न होकर पांडवों को जीवित कर दिया तत्पश्चात ये पांडव अपने गंतव्य की और चले गए।
कला का केंद्र था कटासराज मंदिर
कटासराज मंदिर संगीत, कला और विद्या का भी बड़ा केंद्र था। अपने उत्कर्ष काल में इस मंदिर से लगभग 10,000 विद्वान और कलाकार संबद्ध थे। लेकिन 11वीं सदी में महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद मंदिर का वैभव नष्ट हो गया।
प्राण और आजीविका बचाने के लिए कलाकारों का पलायन हुआ और बहुतों को गुलाम बनाकर अरब में बेच दिया गया जहां से ये यूरोप पहुंचे। कई शोध बताते हैं कि यूरोप की जिप्सी या रोमां जाति के लोग उन्हीं कलाकारों के वंशज हैं जिनके संगीत को रोमां संगीत कहा जाता है।
उनकी भाषा के शब्द भी संस्कृत से मिलते हैं। यूरोप में रोमां जाति के लोगों की एक विशाल संख्या हैं। एक अनुमान के मुताबिक उनकी संख्या 60 लाख से लेकर 2 करोड़ तक है और ये सारे भारतवंशी हैं जो सुदूर अतीत में भारत से प्रवास या अन्य वजहों से वहां गए थे।
हालांकि सारे के सारे रोमां लोगों का संबंध कटासराज से ही हो, इस पर संशय है। लेकिन वे भारत भूमि से सतत प्रवास करने वाले लोग जरूर थे जो हजारों सालों से कई वजहों से देश से बाहर जाते रहे थे।
उनकी भाषा में अभी भी हिंदी-संस्कृत के कई शब्द हैं। भारत सरकार इधर रोमां लोगों को लेकर कुछ सक्रिय हुई है और सन् 2016 में भारत सरकार ने दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय रोमां कांफ्रेंस का आयोजन किया।
उस आयोजन में कई देशों के रोमां विद्वान और प्रतिनिधि शामिल हुए। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि रोमां, भारत की संतान है।
कटासराज मंदिर में एक विश्वविद्यालय भी था जो दर्शनशास्त्र और बौद्ध अध्ययन का बड़ा केंद्र था। कहते हैं कि वहां नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक गोरखनाथ और प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग भी गए थे।
जब विदेशी आक्रमणों की वजह से तक्षशिला का पतन हुआ तो नजदीक होने की वजह से बहुत सारे विद्वान तक्षशिला से पलायन कर बैरागी विश्वविद्यालय आ गए थे। उस इलाके में विश्वविद्यालयों की एक श्रृंखला थी जो तक्षशिला, कटासराज से लेकर कश्मीर के शारदापीठ तक फैली हुई थी।
कटासराज पाकिस्तान के जिस साल्ट रेंज पहाडियों के पास है वहां का सेंधा नमक आज भी हिंदुओं के लिए पवित्र है। छठी से आठवीं सदी के बीच कई राजाओं ने साल्ट रेंज में ढेर सारे मंदिर बनवाए जिसमें अम्बा मंदिर, नंदना किला, काफिरकोट मंदिर, कलार-कहार मंदिर, मलोट-बिलोट मंदिर के अवशेष अभी भी हैं।
पाकिस्तान सरकार ने हाल में कटासराज मंदिर के जीर्णोद्धार और उसे यूनेस्को विरासत सूची में लाने के प्रयास किए हैं।
बता दें कि वर्ष 2005 में अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी कटासराज मंदिर भी गए थे और पाकिस्तान सरकार द्वारा शुरू किए गए मंदिर के संरक्षण कार्य का उद्घाटन भी किया था।
कटासराज में बैसाखी के मौके पर कुंभ
बंटवारे के चलते पाकिस्तान स्थित तीर्थ स्थल कटासराज को आज चाहे भुला दिया गया है, लेकिन किसी जमाने में अंग्रेज भी इसके कायल थे। यहां लगने वाला कुंभ का मेला उन्हें खींच लाता था। इसमें हर धर्म-जाति और कल्चर को देखना उन्हें लुभाता था। यह बात लोगों से शेयर की है भारतीय शोधकर्ता अखिलेश झा ने। उन्होंने अपनी किताब ‘द ब्रिटिश अकाउंट ऑफ कटासराज’ (कटासराज: एक भूली बिसरी दास्तान) में ब्रिटिश इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के हवाले से बताया है कि यहां कुंभ बैसाखी पर लगता था। यह किताब कटासराज का एक सुंदर दस्तावेजीकरण है। अखिलेश झा 1996 बैच के सिविल सेवा अधिकारी हैं और संप्रतिनियुक्ति पर राष्ट्रीय वित्तीय प्रबंधन संस्थान फरीदाबाद में प्रोफेसर हैं। उन्होंने संस्कृति और इतिहास से जुड़े विषयों पर 17 किबातें लिखी हैं। अखिलेश के मुताबिक महाराजा रणजीत सिंह के शासन में अंग्रेज इसके बारे में अक्सर अपने जासूसों, डॉक्टरों और सैन्य अफसरों से बात करते रहते थे। उस दौरान कटासराज यहां आने का अच्छा बहाना होता था। महाराजा रणजीत सिंह के दौर में ब्रिटिश ज्यूलॉजिस्ट एंड्रर्यू फ्लेमिंग यहां आए और अपनी सर्वे रिपोर्ट में लिखा है कि उसने कटासराज में बैसाखी के मौके पर कुंभ सी भीड़ देखी। कैप्टन जेम्सएबोट ने 12 अप्रैल 1848 के बैसाखी मेले में कटास की यात्रा की और उसने वहां जो कुछ देखा, वह उसने उससे पहले कभी नहीं देखा था। वह लिखता है कि उसने अपने जीवन में ऐसा मेला नहीं देखा। उसके अनुसार कटास सरोवर में कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं थी। अरलेस्टिन भी अपने यात्रा वृतांत में ऐसा ही वर्णन करता है। कटास उन्नीसवीं सदी में पंजाब के झेलम जिले में पड़ता था और वहां सभी धर्मों के लोगों में काफी प्रेम और सद्भाव था। किताब के मुताबिक महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य के आखिरी दौर में ही इस तीर्थ का भी डाउनफॉल होने लगा था। एलेक्जेंडर कनिंघम की तरफ से रणजीत सिंह के शासनकाल में जम्मू के गवर्नर गुलाब सिंह की ओर किए गए इशारे का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि कटास के सतघरा मंदिर का नुकसान जितना प्राकृतिक रूप से नहीं हुआ उतना वहां पर अंधाधुंध मरम्मत से हुआ।
नलवे की हवेली
दीवारों पर सदियों पुराने निशान
ये खूबसूरत कलाकारी एक हवेली की दीवारों पर की गई है जो यहां सदियों पहले सिख जनरल हरी सिंह नलवे ने बनवाई थी. इस हवेली के अवशेष आज भी इस हालत में मौजूद हैं कि उस जमाने की एक झलक बखूबी मिलती है। हरी सिंह नलवे की हवेली की एक दीवार पर गणेश की तस्वीर, जिसमें वो अन्य जानवरों को खाने के लिए चीजें दे रहे हैं। ऐसे चित्रों में कोई न कोई हिंदू पौराणिक कहानी है। कटासराज के निर्माण में ज्यादातर चूना इस्तेमाल किया गया है।
सिख जनरल नलवे ने कटासराज में जो हवेली बनवाई, उसके चंद झरोखे आज भी असली हालत में मौजूद हैं। इस तस्वीर में एक अंदरूनी दीवार पर झरोखे के पास खूबसूरत चित्रकारी नजर आती है। कहा जाता है कि कटासराज का सबसे प्राचीन स्तूप सम्राट अशोक ने बनवाया था।
जा सकते हैं 200 भारतीय दर्शन करने
इंडो-पाक प्रोटोकॉल 1972 के अनुसार हर साल 200 भारतीय कटासराज पर तीर्थ करने जा सकते हैं। इसी के तरह हर साल हिंदू धर्म के अनुयायी महाशिवरात्रि के मौके पर इस मंदिर में जाते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।
पाकिस्तान सरकार करा रही है जीर्णोद्धार
पाकिस्तान के पंजाब राज्य की सरकार ने 2006 में कटास राज मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम शुरू किया और आज ये काम अब भी जारी है।
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