रविवार, 22 सितंबर 2019

मुल्तान सूर्य मंदिर, पंजाब, पाकिस्तान

मुल्तान सूर्य मंदिर, आदित्य सूर्य मंदिर (Aditya Sun Temple, Multan)

आदित्य सूर्य मंदिर, पंजाब, पाकिस्तान के मुल्तान में पड़ता है जो पाकिस्तान की सबसे अधिक आबादी वाले हिस्से में से एक है। यह मंदिर मुल्तान के तांबे के बाज़ार में स्थित है। मुल्तान सूर्य मंदिर, आदित्य सूर्य मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।

भारतीय उपमहाद्वीप का पहला सूर्य मंदिर मूल स्थान में था। आज पाकिस्तान में स्थित इस स्थान का नाम अपभ्रंश होकर मुल्तान हो गया है। इसका वर्णन पुराणों में मिलता है। 

सांब कोढ़ से पीड़ित

पौराणिक कथाओं के अनुसार यह मंदिर भगवान कृष्ण के पुत्र सांब ने बनवाया था। भविष्य पुराण, स्कंद पुराण और वराह पुराण में इस बात का उल्लेख है कि श्री कृष्ण ने स्वयं अपने पुत्र सांबा को कोढ़ी होने का श्राप दिया था। तब शाप से मुक्ति के लिए सांब ने यह मंदिर बनवाया और वे पूरी तरह स्वस्थ हो गए थे। कृष्ण ने सांब को शाप क्यों दिया था? इससे एक प्राचीन कथा जुड़ी हुई है। पढ़िए वह कथा -

रामायण में निषादराज जामवंत का उल्लेख आता है जो भगवान श्री राम की सेना में थे। परंतु महाभारत काल में भी जामवंत का जिक्र किया गया है। श्रीकृष्ण और जामवंती के विवाह के पीछे भी एक कहानी है। पुराणों के अनुसार, जामवंत के पास एक दिव्य मणि थी। बहुमूल्य मणि हासिल करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण और जामवंत में 28 दिनों तक युद्ध चला था। युद्ध के दौरान जब जामवंत ने कृष्ण के रूप में स्वयं भगवान राम के स्वरूप को पहचान लिया तब उन्होंने मणि समेत अपनी पुत्री जामवंती का विवाह भी कृष्ण के साथ कर दिया। जामवंती से कृष्ण के पुत्र सांब का जन्म हुआ। कहते हैं कि सांबा इतना सुंदर और आकर्षक था कि कृष्ण की कई पटरानियां भी उसकी सुंदरता के प्रभाव में आ गई थीं। भगवान श्री कृष्ण के आठ रानिया थी।

एक दिन कृष्ण की रानी नंदिनी ने सांबा की पत्नी का रूप धारण कर सांबा को आलिंगन में भर लिया। उसी समय कृष्ण ने ऐसा करते हुए देख लिया। क्रोधित होते हुए कृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोढ़ी हो जाने और मृत्यु के पश्चात् डाकुओं द्वारा उसकी पत्नियों को अपहरण कर ले जाने का श्राप दिया।

पुराण में वर्णित है कि जब सांब कोढ़ से पीड़ित हो गए तो वे महर्षि कटक के पास गए। महर्षि ने उन्हें सूर्यदेव की आराधना करने के लिए कहा। तब सांबा ने चंद्रभागा नदी के किनारे मित्रवन में सूर्य देव का मंदिर बनवाया और 12 वर्षों तक उन्होंने सूर्य देव की कड़ी तपस्या की। वे इसी नदी का पानी पीते और उसी नदी में स्नान करते। सूर्यदेव के आशीर्वाद तथा नदी के जल से वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए। उसी दिन के बाद से आजतक चन्द्रभागा नदी (चिनाब) को कोढ़ ठीक करने वाली नदी के रूप में ख्याति मिली है। मान्यता है कि इस नदी में स्नान करने वाले व्यक्ति का कोढ़ जल्दी ठीक हो जाता है। बाद में सांब ने मुल्तान में सूर्यदेव को समर्पित यह मंदिर बनवाया।

कोणार्क, पुण्यार्क, लोलार्क, देवार्क आदि मंदिर भी शाम्ब ने ही बनवाए थे। यह कहना है कला इतिहासविद, पत्रकार फिल्मकार रंजन कुमार सिंह का।

मंदिर का इतिहास

मुल्तान सूर्य मंदिर बहुत प्राचीन है। इसने इतिहास के अनेक अच्छे-बुरे दौर देखे हैं। प्राचीन यात्रियों ने अपने यात्रा विवरण में इस मंदिर के बारे में लिखा है। इसका जिक्र ग्रीक इतिहासकार Herodotus ने 450BC में किया।

चीन के रहने वाले प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु शुयांग ज़ैंग जो भारत में बौद्ध धर्मग्रंथ पढ़ने आए थे, उन्होंने भारत के अलग-अलग राज्यों का विचरण कर वहां के इतिहास को जानने का प्रयास किया। ज़ैंग ने कई ऐसे स्थानों और धार्मिक स्थलों के प्रति भी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया।

641 ईसवीं में (1500 साल पहले) शुयांग ज़ैंग (Hsuen Tsang) (ह्वेनसांग) इस स्थान पर आए थे, उनका कहना था कि मंदिर में स्थित सूर्य देव की मूर्ति सोने की बनी हुई थी, जिनकी आंखों की जगह पर बहुमूल्य रूबी पत्थर लगाया गया था। सोने, चांदी से बने मंदिर के खंबों पर बेशकीमती पत्थर जड़े हुए थे। ह्वेनसांग ने अपनी लेखनी में इस मंदिर को कोणार्क से भी जोड़ा है।

रोजाना काफी संख्या में हिन्दू धर्म के अनुयायी इस मंदिर में पूजा करने आते थे। बौद्ध भिक्षु के अनुसार उन्होंने यहां देवदासियों को भी नृत्य करते देखा था। सूर्य देव के अलावा, भगवान शिव और बुद्ध की मूर्ति भी इस मंदिर में विराजित थीं।

मंदिर में काफी रौनक रहती थी और दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आते थे। माना जाता है कि यहां विराजमान सूर्यदेव और शिव के दर्शन करने से जटिल रोग तथा दुखों का निवारण हो जाता था।

लेकिन समय के साथ-साथ इस मंदिर का सुनहरा काल भी समाप्त होता चला गया। 8वी सदी में मुहम्मद बिन कासिम की सेना ने जब मुलतान को अपने शासन में ले लिया तब यही मंदिर उनकी सरकार की आय का एक बड़ा साधन साबित हुआ। कासिम ने इस मंदिर में लगे बेशकीमती पत्थर, सोने, चांदी, सबकुछ वे लूटकर ले गए। लेकिन मूर्ति को वैसे रहने दिया और हिन्दुओ को अपमानित करने खातिर मूर्ति पर गाय मांस लटका दिया।

मुहम्मद बिन कासिम ने इस मंदिर के साथ एक मस्जिद का निर्माण करवाया, जो आज के दौर में मुलतान का सबसे भीड़भाड़ वाला इलाका है। इसके बाद कोई हिन्दू राजा मुलतान पर आक्रमण ना कर पाए इसके सूर्य मंदिर को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

दरअसल जो भी हिन्दू शासक मुलतान की ओर आक्रमण करने बढ़ता था, कासिम उसे यह धमकी देता था कि अगर वह मुलतान पर आक्रमण करते हैं तो कासिम सूर्य मंदिर को तबाह कर देगा।

दसवीं शताब्दी में जब अल बरुनी मुलतान ने दौरे पर गए थे तब उन्होंने इस मंदिर का आंखों देखा पूरा ब्यौरा दिया। उनके अनुसार 1026 ईसवीं में मुहम्मद गजनी ने भी इस मंदिर को नष्ट करने का प्रयास किया और इसे पूरी तरह खंडित कर दिया। बरुनी के अनुसार ग्यारहवीं शताबदी में कोई भी हिन्दू अनुयायी इस मंदिर के दर्शन करने नहीं आ सका क्योंकि तब तक गजनी इसे पूरी तरह तबाह कर चुका था और दोबारा कभी इस मंदिर को बनाने का प्रयास तक नहीं किया गया। इसके बाद यहां श्रद्धालुओं का आना बंद हो गया और धीरे-धीरे यहां सिर्फ सुनहरे दौर की यादें ही शेष रह गईं।

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