गुरुवार, 26 सितंबर 2019

राम मंदिर, सैदपुर, पाकिस्तान


पाकिस्तान में मौजूद प्राचीन मंदिरों में से एक इस्लामाबाद के मारगल्ला पहाड़ी के पैरों में स्थित सैदपुर का राम मंदिर भी है। इस्लामाबाद का ये आखिरी हिंदू मंदिर भगवान राम का मंदिर है जिसे अकबर के सेनाप‌ति राजा मान सिंह ने 1580 के आसपास में बनवाया था। सैदपुर मंदिर के आसपास चार तालाब हैं जिनका नाम - रामकुंड, लक्ष्मण कुंड, सीता कुंड और हनुमान कुंड है। जो गांव वाले इस्तेमाल किया करते थे। यहां प्रागैतिहासिक काल की गुफाएं भी मिली हैं।

मंदिर के साथ यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशाला भी बनाई गई, मगर इस धर्मशाला का कई सालों से पब्लिक टायलेट के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ऐसी कोई जगह नहीं, जहां हिंदू अपने धार्मिक समागम आयोजित कर सकें। वहां एक प्राचीन राम मंदिर मौजूद हैं, लेकिन हिंदुओं को वहां पूजा-अर्चना करने की इजाजत नहीं।

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के मैंबर नेशनल एसेंबली लाल चंद मल्ही ने वीरवार 11 अगस्त के ‘नेशनल मायनोरिटी डे’ पर राम मंदिर को हिंदू परिवारों के हवाले किए जाने की मांग को उठाते हुए पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को चिट्ठी लिखा था। मल्ही ने बताया, इस्लामाबाद शहर में लगभग साढ़े आठ सौ हिंदू रहते हैं, उन्हें राम मंदिर मे जाने का अधिकार मिलना ही चाहिए।

2006 में सैदपुर को टूरिस्ट साइट का दर्जा दे दिया गया, मगर मंदिर को हिंदुओं के हाथों में नहीं सौंपा गया। मल्ही कहते हैं कि इस्लामाबाद के मेयर अंसार अजीज ने भी हिंदुओं की मांग की हिमायत की है। उन्होंने कहा, मंदिर के गलत इस्तेमाल का सिलसिला जल्द बंद होना चाहिए। यह हिंदुओं की अमानत है और बड़े अदब के साथ उन्हें लौटा दी जानी चाहिए।

इस्लामाबाद के मिट्ठी थारपारकर के मानवाधिकार कार्यकर्ता कपिल देव ने बताया, भारत-पाकिस्तान के बंटवारे से पहले सैदपुर में बड़ी संख्या में हिंदू परिवार रहते थे। 1947 में उनमें से अधिकांश भारत चले गए और इसी के साथ मंदिर की मर्यादा खत्म होने लगी। उन्होंने कहा, अब हालत यह है कि गैर हिंदू लोग जूतों समेत ही मंदिर में चले जाते हैं।

जर्मन एनजीओ के लिए काम करने वाले कपिल देव वहां राम मंदिर की फिर से मरम्मत की मांग कर रहे हैं। कपिल कहते हैं, "जब सरकार लाल मस्जिद, फ़ैसल मस्जिद और गिरजाघरों को सुरक्षा दे सकती है, तो हमारे मंदिरों को क्यों नहीं?"

कपिल की ये भी शिकायत है, "केवल इस्लामाबाद में क़रीब 300 हिन्दू घर आबाद हैं, लेकिन मंदिर तो दूर की बात, कोई सामुदायिक भवन भी हमारे लिए नहीं है, और किसी भी त्यौहार या अंतिम संस्कार के लिए हमें रावलपिंडी जाना पड़ता है।"

साल 2008 में इस्लामाबाद की सीडीए ने इस गांव को 'धरोहर गांव' मानते हुए, इसके पुनर्निर्माण का काम शुरू किया, तब से इसे सैयदपुर गांव के नाम से जाना जाने लगा।

मर्गल्लाह की पहाड़ियों के बीच इतिहास कि दास्तां सुनाते सैयदपुर गांव में होटल खुल गए हैं और स्थानीय कारीगरों के लिए भी रोज़ी रोटी का रास्ता खुल गया है। इस पुनर्निर्माण में राम मंदिर परिसर की भी रंगाई-पुताई हुई है लेकिन मंदिर से मूर्तियां उठा ली गई हैं

सैयदपुर गांव में मांसाहार सर्व करने वाले होटलों पर तो बड़े बड़े बोर्ड लगे हुए हैं, मगर राम मंदिर परिसर का नाम ढूंढ़ने से भी नज़र नहीं आता। मूर्तियों से खाली इस मंदिर का दरवाज़ा ज़रूर खुला मिलता है और यहां ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है कि 'मंदिर में जुते पहनकर आना मना है'।

हिंदू समुदाय के पाकिस्तानी सांसद डॉक्टर रमेश वांकवानी का कहना है कि इस्लामाबाद के नए मेयर ने उनसे सितंबर 2016 में इस मंदिर परिसर को फिर से तैयार करके हिंदू समुदाय के हवाले करने का वादा किया है। डॉ वांकवानी को इस वादे पर भरोसा है, मगर कपिल देव उसे सिर्फ़ सियासी वादा मानते हैं। उनका मानना है कि वांकवानी भी सत्ताधारी पार्टी पीएमएल (नवाज़) से हैं, इसलिए ये सरकारी वादा है और ऐसे वादे कम ही पूरे होते हैं।

कपिल का कहना है, पूरे पाकिस्तान में जितनी भी ऐसी पवित्र जगहें हैं, उनकी शरणार्थी संपत्ती ट्रस्ट का प्रमुख, एक हिंदू होना चाहिए, जो इन जगहों का पूरा सम्मान कर सके और इन पर गैर क़ानूनी क़ब्ज़े न हों।

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के आसपास और पंजाब के रावलपिंडी शहर में कई ऐतिहासिक मंदिर और गुरुद्वारे मौजूद हैं।

इस्लामाबाद की क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी के आर्कियोलॉजी विभाग के प्रोफ़ेसर सादिद आरिफ़ के मुताबिक़ इस्लामाबाद में पुराने समय के 3 मंदिर हुआ करते थे। एक सैयदपुर, दूसरा रावल धाम और तीसरा गोलरा के मशहूर दारगढ़ के पास है। बंटवारे के बाद इन सभी की देखरेख जैसे थम सी गई। साल 1950 के लियाक़त-नेहरु समझौते में ऐसी सभी पवित्र जगहों को 'शरणार्थी संपत्ती ट्रस्ट' के हवाले किया जाना था।

लेकिन सैयदपुर गांव और राम मंदिर परिसर, जो इस्लामाबाद के क्षेत्र में तक़रीबन ढाई सौ साल पहले बनाए गए थे, वो इस्लामाबाद के सीडीए या कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी के अधीन हैं।

इस मंदिर और गांव के बारे में प्रोफ़ेसर सादिद ने रावलपिंडी गज़ेटियर से कुछ जानकारी हासिल की है। इसके मुताबिक अंग्रेज़ों के दौर में 1890 में जब गज़ेटियर संकलित किया गया, तो ये दर्ज किया गया कि सैयदपुर गांव लगभग 1848 में बस चुका था।

इसमें राम मंदिर, गुरुद्वारा और एक धर्मशाला भी बनाए गए थे, जहां हर साल लगभग आठ हज़ार लोग मंदिर के दर्शन के लिए आते थे। फिर बंटवारे के बाद ज़्यादातर हिन्दू भारत चले गए तो ये सारी जगहों को 'शत्रु संपत्ती' मानते हुए सील कर दिया गया।

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