गुरुवार, 19 सितंबर 2019

गौरी मंदिर, थारपारकर, पाकिस्तान

यह है पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा मंदिर, कुंए को माना जाता है चमत्कारी

आदिवासी मुस्लिम लोगों को “थारी हिन्दू”  कहा जाता है

पाकिस्तान में स्थित हिंदू धर्म का तीसरा विशाल मंदिर गौरी मंदिर है। ये मंदिर सिंध प्रांत के थारपारकर जिले में स्थित है। पाकिस्तान के इस जिले में वैसे तो मुस्लिम समाज अधिक है लेकिन पाकिस्तान में सबसे अधिक हिन्दू इसी थारपारकर जिले में ही रहते हैं और इनमें से अधिकतर आदिवासी (वनवासी) हैं। पाकिस्तान के मूल लोग इन्हें थारी हिंदू कहते हैं। थारपारकर में इन थारी हिन्दुओं की आबादी कुल आबादी के करीब 40 फीसदी है।

मान्यता है कि ये गौरी मंदिर मूल रुप से जैन मंदिर है। लेकिन इसमें अधिकतर हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। इस मंदिर में माता गौरी की विशाल प्रतिमा रखी हुई है। मूल रूप से जैन धर्म को समर्पित यह मंदिर अपने स्थापत्य के लिहाज से बेजोड़ है। इस मंदिर की स्थापत्य शैली राजस्थान और गुजरात की सीमा पर बसे माउंट आबू के मंदिरों जैसी है। इस मंदिर का निर्माण मध्ययुग में हुआ। इस मंदिर की स्थापना 16वीं सदी के आस-पास की मानी जाती है। थार के बाकि जगहों की अपेक्षा इस सफेद पत्थर से बने मंदिर में शायद ही अब कोई पूजा होती होगी। इस मंदिर के पास के गांव को गौरी गांव भी कहा जाता है।

बात यह हैं कि यह मंदिर अपने में एक रहस्य बन चुका हैं क्योंकि यह मालूम नहीं चल सका हैं कि मूल रूप से यह किसके लिए किसने निर्मित कराया था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर के निर्माण के लिए मान्यता है कि इस मंदिर को एक अमीर हिंदू व्यापारी ने भगवान पार्शवनाथ के लिए बनवाया था। भगवान पार्शवनाथ (पार्श्वनाथ) जैन धर्म के तेईसवें अनुयायी (23वें तीथंर्कर) माने जाते हैं। भगवान पार्श्वनाथ की मुख्य मूर्ति अब वहां से हटाकर मुंबई में स्थापित की जा चुकी है जिन्हें गोदीजी पार्श्वनाथ कहते हैं। लेकिन पाकिस्तान में शायद ही अब कोई जैन धर्म के लोग हों जो इस मंदिर का रख-रखाव करें। हालांकि अब पाकिस्तान में जैन धर्म के अनुयायी नाममात्र के बचे हैं लेकिन इस मंदिर परिसर में स्थानीय भील और थारी हिन्दू पूजा-उपासना करते हैं।

वास्तुकला का अद्भुत नमूना एक रहस्मयी जगह बनकर रह गया है। ये मंदिर किसी और संस्कृति का नमूना भी माना जा सकता है क्योंकि इसकी वास्तुकला मिली-जुली हुई है। इस मंदिर की दिवारें मार्बल से सीढ़ीनुमाकार में बनी हुई हैं। इस मंदिर में नक्काशी का बहुत कार्य हुआ हैं, मंदिर की गुमंद की छत के ऊपर नक्काशी की हुई है जो रख-रखाव की कमी के कारण अब हल्की होती जा रही है।

इस मंदिर के पास एक कुंआ है जिसे वहां के स्थानीय लोग जादुई (चमत्कारी) मानते हैं। प्राचीन कुआं होने के बावजूद आज भी इस कुएं से शुद्ध और साफ़ पानी निकलता हैं। इसे मारवी जो कुंह के नाम से जाना जाता है। वहां के स्थानीयों के अनुसार मान्यता है कि एक थारी महिला का राजा उमेर ने अपहरण कर लिया था। वो महिला इसी कुंए के पास थी, जब उसका अपहरण किया गया। इसलिए माना जाता है कि ये कुंआ कभी भी नहीं सूखता है। इसके साथ ही इसका पानी भी एकदम साफ है, ऐसा लगता है कि हमेशा से इसका रख-रखाव किया गया है। माना जाता है कि मारवी नाम की महिला आज भी इस स्थान पर रहती है। गौरी के मंदिर के लिए लोगों का मानना है कि माता गौरी के आर्शीवाद से ये कुंआ कभी नहीं सूखता है।

पाकिस्तान के बिगड़ते हालात और कट्टरपंथियों के बढ़ते प्रभाव के कारण यह मंदिर भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुका है। हमलों की वजह से मंदिर में लगी हिंदुओं और जैन धर्म की काफी मूर्तियां क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं।

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