रामगढ़ ताल, गोरखपुर शहर के अन्दर स्थित एक विशाल तालाब (ताल) है। यह 723 हेक्टेयर (लगभग 1800 एकड़) क्षेत्र में फैला हुआ है। इसका परिमाप लगभग 18 किमी है।
इसके पूर्व में परमात्मा शिव का सुप्रसिद्ध मंदिर है जिसे “झारखंडी महादेव” के नाम से जाना जाता है। उत्तर के घाट पर “घटही माता” का मंदिर है जो भक्तों की मनोकामना पूरण करती हैं। दक्षिण में बना है “नौका विहार” जो कि पर्यटकों के मुख़्य आकर्षण का केंद्र है।
रामगढ़ ताल के चारों तरफ 10 मीटर चौड़ा बाँध बनाया गया है। 2009 में योजना की लागत 124 करोड़ रखी गयी थी। फिर 2013 में इसमें 68 करोड़ का इजाफा किया गया। उसमें से अब तक 125 करोड़ की लागत खर्च हो चुकी है। यहाँ पर पर्यटन के लिए पड़ोसी देश नेपाल से बहुतायत संख्या में सैलानी आते हैं। यह आस-पास के राज्यों के लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है।
शाम होते ही प्रतिदिन यहाँ प्रेमी जोड़े, नवविवाहित कपल एवं फेमिली की हजारों की संख्या में भीड़ होती है। सूर्यास्त के समय नौकाविहार करना बेहद रोमांचक लगता है। नौकाविहार की कीमत भी बहुत ही कम है।
कुल मिलाकर मानवीय अवहेलना का शिकार रामगढ़ ताल बीमार सा हो गया था। परन्तु सरकार की सकारात्मक सोच और तत्कालिक कार्यान्वयन के कारण आज यह एशिया का सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन गया है।
रामगढ़ ताल के बनने की कहानी (दंत कथा)
गोरखपुर से लगभग 25 किलोमीटर की दूर पर स्थित अकुलहीं गांव में रामगढ़ ताल के बनने की त्रासदी के राज छिपे हैं। इस गांव में ही स्थित है प्राचीन शिव मंदिर जहां से रामगढ़ ताल के बनने की कहानी शुरू हुई। इसी गांव के रहने वाले लोगो का मानना है कि इस प्राचीन शिव मंदिर से बहुत सी कहानियां जुडी हैं जिनमें से एक है रामगढ़ का राज्य ध्वस्त होने और रामगढ़ ताल बनने की कहानी।
हजारों वर्ष पहले की बात है। एक बहुत बड़ा “रामगढ़” नामक राज्य हुआ करता था। यहाँ की महारानी परमात्मा, शिव की बहुत बड़ी भक्त थी। गोरखपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर एक गाँव में प्राचीन शिव मंदिर स्थित था। प्रतिदिन रानी और राजा वहां जाकर जलाभिषेक करते थे। तत्पश्चात फिर से अपने महल “रामगढ़ राज्य” वापस आ जाते थे और फिर दैनिक कार्य आरम्भ करते थे।
एक दिन रानी को मंदिर पहुंचने में विलंब हो गया तो वहाँ के स्थानीय लोगों (स्थानीय ब्राह्मण और कुछ अन्य जाति के लोगो) ने शिव का जलाभिषेक कर दिया था। बाद में रानी वहाँ पहुँची तो यह देखकर वह क्षुब्ध हो गई और बिना पूजा किए ही महल वापस आ गई। राजा को बहुत क्रोध आया और उन्होंने क्रोध के वशीभूत होकर भूमिधर शिव मंदिर को तोप से उड़ा दिया।
उसके बाद जब वो रामगढ़ राज्य वापस आए तो देखा कि रामगढ़ राज्य पूरा जलमग्न हो गया है। यह सब देख कर राजा आश्चर्यचकित हो गए। तभी से यह रामगढ़ राज्य जल से भरा हुआ एक बहुत बड़े ताल के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
वहीं राज्य में केवल एक पंडित और एक बिल्ली बची थी। राजा वहां से कहां गए यह किसी को पता नहीं।
1700 एकड़ में फैला रामगढ़ ताल केवल शहर के लिए जल का एक बड़ा स्रोत नहीं है बल्कि अपने अंदर उतना ही बड़ा एक इतिहास छिपाए हुए है। एक ऐसा इतिहास जो आस्था से जुड़ा हुआ है और साथ ही आस्था पर आघात करने वालों को दी गयी सजा को भी बयां करता है।
खतरे में है रामगढ़ ताल
1917 में यह रामगढ़ ताल करीब 1900 एकड़ में फैला था जो अब सिकुड़कर 1700 एकड़ में पहुंच चुका है। 2008 में प्रदूषण के कारण इस ताल की बहुत सी मछलियां मर गई थीं। वहीं, कुल 40 प्रजातियों की मछलियों में महज गिनती की कुछ प्रजाति बची हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम के तहत इसकी गाद और जलकुंभी आदि हटाई गई। साथ ही इसका सौंदर्यीकरण भी किया गया लेकिन रामगढ़ ताल पर अतिक्रमण ने यहां के इलाके में भू-जल संकट पैदा कर दिया है।
एनजीटी में रामगढ़ ताल के संरक्षण का मामला उठाने वाले गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति राधे मोहन मिश्रा कहते हैं कि रामगढ़ ताल ने प्राचीन इतिहास के गणतंत्र की जनपदीय व्यवस्था से लेकर आधुनिक लोकतंत्र के इतिहास को देखा है। रामगढ़ ताल कोलीय गणतंत्र की राजधानी थी। उन्होंने बताया कि गोरखपुर का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है जहां राप्ती नदी बही न हों। यह रामगढ़ तल भी राप्ती नदी का ही हिस्सा है। अब राप्ती शहर से दूर दक्षिण की तरफ खिसक गई हैं।
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