बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

बन्नी उत्सव, आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश में दशहरे के दिन खूनी 'बन्नी उत्सव'

आंध्र प्रदेश में दशहरे के दिन बन्नी उत्सव मनाया जाता है। बन्नी देवी मल्लामा (पार्वती) और देवता मलामल्लेश्वर स्वामी (शिव) को समर्पित उत्सव है जो होलागुंडा मंडल के देवारागट्टू में आयोजित होता है। दशहरे के अवसर पर आयोजित होने वाले इस उत्सव में हाथ में गदा और डंडे लिए हजारों श्रद्धालु एक दूसरे पर खूनी वार करते हैं। हालांकि बताया जाता है कि ‘बन्नी’ के मौके पर मंदिर में नकली लड़ाई होती है जिसमें धार्मिक रीति के तौर पर एक दूसरे से डंडों से लड़ाई लड़ी जाती है।

आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित कुर्नूल जिले में एक मंदिर में आयोजित इस उत्सव में लगभग 100 से ज्यादा लोग हाथ में डंडा लिए एक दूसरे को बुरी तरह मारते हैं। इस खूनी उत्सव के दौरान कई लोग बूरी तरह घायल हो जाते हैं। इस दौरान कुछ लोग हाथ में मशाल धरे भी रहते हैं। प्रति वर्ष दशहरे के दिन देवरगट्टु की परिधि में 11 ग्रामों के लोग उत्सव में शामिल होते हैं।

मंदिर के पुजारी रामकुमार शास्त्री ने बताया कि यह भी डांडिया की तरह ही है बस इसमें बड़े डंडे का प्रयोग किया जाता है। श्रद्धालुओं के जोश और उत्साह के चलते कई बार चोट भी लग जाती है। उन्होंने कहा कि पुराने समय में इस उत्सव में डंडे की जगह कुल्हाड़ी और बर्छी का उपयोग किया जाता था।

एक स्थानीय पुलिस के अनुसार यह उत्सव एक हजार वर्ष से चला आ रहा है जबकि विजयनगर साम्राज्य अपने अस्त्वि में था।

इस उत्सव के दौरान डॉक्टरों की एक टीम मौजूद रहती है, जो घायलों का उपचार करती है।

इस कारण मनाया जाता है त्योहार

गौरतलब है कि गांव में माला मल्लेश्वरा स्वामी मंदिर के सम्मान में आयोजित होने वाले इस उत्सव में लाठियों से होने वाली एक लड़ाई भी शामिल होती है, जहां प्रतिभागी दो देवताओं को अपने कब्जे में लेने की कोशिश करते हैं। 

उनका यह मानना है कि यदि वे दोनों में से किसी देवता की मूर्ति को अपने यहां लाने में कामयाब होते हैं, तो यह उनके गांव में समृद्धि लाएगा। प्रतिमा हासिल करने के बाद कल्याण उत्सव का आयोजन किया जाता है। मंदिर का स्वामित्व और प्रबंधन नेरानिकी गांव के निवासियों द्वारा किया जाता है जो इन देवताओं की रक्षा करते हैं।

लोककथाओं के अनुसार, स्थानीय लोगों ने बताया कि मणि और मल्लासुरा नाम के दो राक्षक पास की पहाड़ियों में रहते थे, और कुछ संतों को बहुत परेशान करते थे। इससे परेशान होकर संतों ने भगवान परमेस्वर और पार्वती से उन्हें बचाने की प्रार्थना की, जिसके बाद परमेस्वर पहाड़ी के ऊपर एक पत्थर पर प्रकट हुए और दशहरे की रात राक्षसों को खत्म कर दिया।

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