दिवाक माता मंदिर (Divak mata temple) : माता का एक अनोखा मंदिर, जहां मां को प्रसाद के रुप में चढ़ाई जाती हैं हथकड़ियां और बेड़ियां
भारत धर्म, भक्ति, अध्यात्म और साधना का देश है। यहां प्राचीन काल से पूजा-स्थल के रूप में मंदिर विशेष महत्व रखते रहे हैं। यहां मंदिरों को लेकर लोगों की काफी आस्था जुड़ी हुई हैं, इन्हीं मान्यताओं के अनुसार हजारों की संख्या में मंदिर और शिवालय है जिनमें कई तरह की मान्यताएं और विस्मयकारी चमत्कार जुड़े हुए हैं। किसी मंदिर में चॉकलेट का भोग लगाया जाता है तो किसी मंदिर में चप्पल चढ़ाया जाता हैं।
भगवान के मंदिर में श्रद्धालु उन्हें प्रसन्न करने के लिए प्रसाद के रूप में फल, फूल- मालाओं, मिठाई, पेड़े, हलवा-पूरी,धूप-अगरबत्ती, नारियल-चुनरी, मेहंदी आदि चढ़ाते हैं। तो कहीं कोई भेंट के रूप के लिए सामान चढ़ाता है। स्त्रीयां अक्सर ही वहीं माता के मंदिरों में उन्हें सिन्दूर, चूडियां, बिंदी और वस्त्र या सोलह श्रृंगार का सामान अपर्ण किया जाता है। जिससे उनका सुहाग भी बना रहता है और पति की उम्र भी लम्बी होती है। लेकिन हमारे देश में एक ऐसा भी मंदिर है जिसमें देवी को प्रसन्न करने के लिए हथकड़ी और बेड़ियां चढ़ाई जाती हैं। कहा जाता है कि जो यहां हथकड़ी और बेड़ियां चढ़ाता है, वह निराश नहीं लौटता है।
यह मंदिर राजस्थान के प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से महज 35 किलोमीटर की दूरी पर जोलर ग्राम पंचायत नाम की जगह पर है, जिसका नाम दिवाक माता का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर देवलिया के पास घने जंगल में स्थित है। देवी का ये मंदिर ऊँचे पहाड़ पर स्थित है। जो कि चारों तरफ से घने जंगल से घिरा हुआ है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को छोटी-बड़ी पहाड़ियों और ऊंची-नीची जगहों को पार कर पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है। मंदिर के प्रति श्रद्धा के चलते इस इलाके में कोई पेड़ नहीं काटा जाता है। इस मंदिर में भक्त दूर-दूर से अपनी मन्नत पूरी करने के लिए आते हैं।
200 साल पुराना है त्रिशूल
इस मंदिर के आंगन में करीब 200 साल पुराना त्रिशूल है जिस पर लोग बेडियां चढ़ाते हैं। मान्यता है कि माता का नाम भर लेने से हथकड़ियां और बेड़ियां अपने आप ही खुल जाती हैं। इस त्रिशूल पर जो हथकड़ियां चढ़ी हैं, उनमें से कई तो 100 - 150 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं।
ये मन्नतें लेकर आते हैं भक्त
कहते हैं कि जिनके परिजन जेल में हैं या फिर किसी कानूनी कार्रवाई में फंसे हैं, वह यहां आकर हथकड़ी और बेड़ियां चढ़ाते हैं। साथ ही देवी मां से अपने परिजनों की रिहाई और कानूनी कार्रवाई से मुक्ति की अर्जी लगाते हैं। मंदिर आने वाले श्रद्धालु बताते हैं कि यहां आने वाले किसी भी भक्त की झोली कभी खाली नहीं रही।
डाकू मांगते थे मन्नत
इस मंदिर से जुड़ी एक कहानी है। बहुत समय पहले यहां केवल जंगल हुआ करते थे। उस समय इस जंगल में काफी डाकू रहते थे। वे डाकू यहां पूजा करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने यह मन्नत मांगनी शुरू कर दी कि अगर वे डाका डालने में सफल रहे या जेल तोड़कर भाग निकले और पुलिस के चंगुस से बच जाएंगे तो वे मंदिर में आकर प्रशाद के रुप में हथकड़ी और बेड़ियां चढ़ाएंगे। उस समय से अब तक ये चलन चला आ रहा है।
खूंखार डाकुओं ने शुरू की यह परंपरा
मान्यता है कि प्राचीन समय में मालवा-मेवाड़ के अंचल में खूंखार डाकुओं का बोलबाला था। इन डाकुओं में रियासत काल के एक नामी डाकू पृथ्वीराणा ने जेल में दिवाक माता की मन्नत मांगी थी कि अगर वह जेल तोड़कर भागने में सफल रहा, तो वह सीधा यहां दर्शन करने के लिए आएगा।
यहां के लोग कहते हैं कि उसने जैसे ही माता को याद किया, उसकी बेडियां अपने आप ही टूट गईं और वह जेल से भाग निकला। तभी से यहां परंपरा चली आ रही है जो आज भी जिंदा है।
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